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उत्तराखण्ड

गरीबी, पलायन, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी समस्याएँ आज भी पहाड़ के विकास में बाधक- यशपाल आर्य

नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने प्रदेश से जुड़े मुद्दों पर की चर्चा

आबादी घाटी से मैदान की तरफ खिसक रही, विधानसभा में उठा पलायन का मुद्दा

देहरादून। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के विधानसभा सत्र में संबोधन के अवसर पर नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने प्रदेश से जुड़े मुद्दों की चर्चा की। 25 साल की यात्रा व प्रदेश की विभिन्न खूबियों का उल्लेख भी किया। कहा कि उत्तराखंड सभी मानकों में एक विशिष्ट प्रदेश है। भौगोलिक दृष्टि से यह राज्य दक्षिण एशियाई क्षेत्र में अपनी सीमाएं नेपाल और तिब्बत से जोड़ता है। उत्तर में गिरीराज हिमालय उत्तराखंड और देश की रक्षा में अडिग प्रहरी की तरह खड़ा है।

आर्य ने कहा कि देवताओं की आत्मा वाले इस हिमालयी प्रदेश की विधानसभा में महामहिम का स्वागत करना उनका अहोभाग्य है। प्रकृति ने इस राज्य को हिमालय के साथ ही हिमालय की गोद से निकलने वाली ‘‘सदा नीरा’’ नदियाँ दी हैं, जो सदियों से आधे भारत की धरती की प्यास बुझा रही हैं। इन नदियों के साथ बहती ‘‘गंगा-जमुनी संस्कृति’’ ने इस भूमि को सहिष्णुता का प्रतीक बनाया है।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में असंख्य ताल और कुण्ड हैं, जिनमें कई ‘‘पार्वती कुण्ड’’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। मध्य हिमालय का नैनीताल, तराई का नानकसागर और 6 राष्ट्रीय उद्यान व 7 वन्यजीव अभयारण्य इस प्रदेश की जैव विविधता के प्रतीक हैं। इसी कारण हिमालय और उत्तराखंड को भारत भूमि का ‘‘ऑक्सीजन टावर’’ कहा जाता है।

नेता प्रतिपक्ष ने महामहिम राष्ट्रपति को ‘‘प्रकृति की बेटी’’ कहते हुए कहा कि जैसे वे ओडिशा के सिमलीपाल राष्ट्रीय उद्यान की गोद में पली-बढ़ी हैं, वैसे ही उत्तराखंड की महिलाएँ भी जंगलों को अपना मायका मानती हैं। जब-जब जल, जंगल और जमीन पर संकट आया, यहाँ की महिलाएँ संघर्ष के लिए घरों से निकल पड़ीं। विश्वविख्यात ‘‘चिपको आंदोलन’’ इसी धरती पर 1974 में गौरा देवी के नेतृत्व में शुरू हुआ था।

आर्य ने कहा कि उत्तराखंड धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता का गुलदस्ता है। यहाँ चारधामों में श्री बदरीनाथ, श्री केदारनाथ, श्री गंगोत्री और श्री यमुनोत्री जैसे पवित्र स्थल हैं। 15200 फीट की ऊंचाई पर स्थित हेमकुंड साहिब और तराई का नानकमत्ता साहिब सिख धर्म के आस्था केंद्र हैं। वहीं रुड़की के पास स्थित पीरान कलियर दरगाह सूफी परंपरा का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि देवभूमि का समाज सदियों से समावेशी रहा है, जिसने सभी को अपनाया और सम्मान दिया है। परंतु, यह राज्य अपनी प्राकृतिक विडंबनाओं से भी जूझ रहा है। हाल की आपदाओं में धराली, थराली, बसुकेदार और देहरादून में जनहानि हुई।

आर्य ने कहा कि उत्तराखंड के जंगल देश-दुनिया के पर्यावरण की रक्षा कर रहे हैं, लेकिन वन्य जीवों के कारण किसानों की खेती नष्ट हो रही है। वन्य जीव-मानव संघर्ष और वन कानून आमजन के लिए बड़ी समस्या हैं। 2006 में देशभर में लागू वनाधिकार कानून के बावजूद उत्तराखंड में आज तक इसके लाभ ग्रामीणों तक नहीं पहुँचे हैं।

उन्होंने कहा कि गरीबी, पलायन, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी समस्याएँ आज भी पहाड़ के विकास में बाधक हैं। कृषि योग्य भूमि की कमी, कठिन जीवन, रोजगार व स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में लोग पलायन को विवश हैं। महिलाओं पर खेती और गृहस्थी का सारा बोझ है।

आर्य ने कहा कि बेरोजगारी, तकनीकी कौशल की कमी, औद्योगीकरण का अभाव और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों की अनुपस्थिति के कारण पहाड़ी अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर नहीं हो पाई है। शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति भी अब तक संतोषजनक नहीं है।

उन्होंने कहा कि राज्य के विकास के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, कृषि, उद्यमिता, पर्यटन, ऊर्जा और जलापूर्ति जैसे क्षेत्रों में सतत प्रयासों की आवश्यकता है।

अंत में नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि महामहिम राष्ट्रपति का विधानसभा में स्वागत उत्तराखंड के लिए गौरव का क्षण है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि महामहिम के मार्गदर्शन से राज्य सरकार प्रदेशहित में ठोस कदम उठाएगी।

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Ghanshyam Chandra

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