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बुजुर्ग माता-पिता ने सुपूत की शहादत की यादों पर धूल की परत नहीं जमने दी

कारगिल विजय के 20 साल: इस बुजुर्ग माता-पिता ने सुपूत की शहादत की यादों पर धूल की परत नहीं जमने दीKargil war 20 Year परिवार ने अपने सुपूत की शहादत की यादों पर धूल की परत नहीं जमने दी। शहीद की एक-एक चीज को परिवार ने मढ़वाकर अलमारी की तिजोरी में संजोकर रखा है।

रामगढ़, सैन्य वर्दी, जूते, कलाई से टूटी घड़ी, जेब से मिला पर्स और उसमें मौजूदा 110 रुपये। बूढ़े मां-बाप के लिए अब यही जीने का सहारा है। कारगिल युद्ध के 20 साल बीत जाने के बाद आज भी सांबा जिले के रामगढ़ के शहीद गुरदीप सिंह सोनी के परिवार ने अपने सुपूत की शहादत की यादों पर धूल की परत नहीं जमने दी। शहीद की एक-एक चीज को परिवार ने मढ़वाकर अलमारी की तिजोरी में संजोकर रखा है। इसमें बेटे के बचपन की तस्वीरें, युवावस्था की सभी चीजें और खिलौने तक शामिल हैं।

आठ सिख रेजिमेंट के शहीद गुरमीत सिंह के पिता सरदार मोहन सिंह और मां मंजीत कौर ने कहा कि जब भी उन्हें बेटे की याद सताती है तो वह उसकी हर चीज का स्पर्श करके कलेजे से लगा लगे हैं। तीन बहनों और माता-पिता के इस इकलौते सहारे के छिन जाने का गम आज भी परिवार की आंखों से सैलाब बनकर उमड़ पड़ता है। जहां परिजनों को अपने दुलारे की शहादत पर गर्व है, वहीं उसके बिछुडऩे का गम हर समय शूल बनकर सीने में चुबता रहता है।

आज भी इस वीर सुपूत शहीद गुरदीप सिंह की शहादत के किस्से उनके पैतृक गांव शेखुपुरा पलोटा में शान से दौहराए जाते हैं। छह जुलाई को गांव के समारक स्थल पर श्रद्धांजलि समारोह मनाया जाता है।

सबसे खतरनाक मिश्न टाइगर हिल के इंडिया गेट को फतेह करते पाई थी शहादत

गुरदीप सिंह सोनी 24 दिसंबर 1998 को फौज में भर्ती हुए थे। गुरदीप परिवार में सबसे छोटे थे। 14 मई 1999 को शुरू हुए कारगिल युद्ध के पांच दिन बाद आठ सिख रेजिमेंट की डेल्टा कंपनी को कारगिल की रक्षा का जिम्मा सौंपा गया।

दो सैन्य अधिकारियों, पांच जेसीओ तथा 120 जवानों की टुकड़ी के साथ आठ सिख रेजिमेंट की डेल्टा कंपनी कारगिल को दुश्मन के कब्जे से मुक्त करवाने के लिए द्रास पहुंची। डेल्टा कंपनी को कारगिल के पश्चिमी क्षेत्र से दुश्मन को रोकने और उसे पीछे से मिलने वाली मदद का संपर्क ठप करने की जिम्मेदारी मिली। डेल्टा कंपनी के जवानों ने अपने मिश्न की शुरुआत की और समुद्रतल से करीब 17 हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित कारगिल की परियां दा तलाब और काला पत्थर चोटी पर पहुंचने में कामयाबी हासिल की। डेल्टा कंपनी को कदम-कदम पर कड़ी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

कारगिल की ऊंची चौकियों पर बैठा दुश्मन लगातर गोलीबारी कर रहा था। इस युद्ध में कंपनी को शुरुआत में ही अपने एक लेफ्टिनेंट कर्नल और नायक की शहादत का गम झेलना पड़ा। दिन के समय पहाडिय़ों की आड़ में छिपकर रहने के बाद जवानों को रात के समय आगे बढऩा पड़ता था।

इसी बीच, डेल्टा कंपनी को सबसे खतरनाक मिश्न टाइगर हिल के इंडिया गेट को फतेह करने का आदेश मिला। 92 इंफेंट्री ब्रिगेड कमांडर एमपीएस भाजवा के आदेश का पालन करते हुए कंपनी कमांडर कर्नल एसपी सिंह ने विशेष घातक पलाटून दस्ते का गठन किया। इस दस्ते में दो अफिसर, पांच जेसीओ तथा 52 जवान शामिल किए गए। इस दस्ते का नेतृत्व गुरदीप सिंह सोनी को दिया गया। घातक दस्ते ने इंडिया गेट टाइगर हिल को दुश्मन से पश्चिमी दिशा को कवर करना शुरू कर दिया।

पंद्रह दिन के इस मिशन को कवर करते हुए चार जुलाई को पलाटून इंडिया गेट पहुंची और वहां छिपे बैठे दुश्मन से आमना-सामना हुआ। पलाटून के जवान एक-एक करते शहीद हो रहे थे और जांबाज सिपाही गुरदीप सिंह सोनी अपने जवानों के साथ आगे बढ़ते गए।

वहीं कारगिल को दुश्मन से मुक्त करवाने के लिए चारों तरफ से चलाया जा रहा सैन्य मिश्न भी अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर रहा था। इसी दौरान छह जुलाई को गुरदीप सिंह सोनी ने सुबह छह बजे दुश्मन से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की। गुरदीप की वीरता पर उन्हें मरनोपरांत सेना मेडल से सम्मानित किया गया।

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Ghanshyam Chandra

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