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उत्तराखंड की सांस्कृतिक, धार्मिक व लोक-परम्पराओं पर आधारित बाल-पर्व, “फूलदेई” प्रकृति व मानव के बीच स्नेह का प्रतीक है

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आकाश ज्ञान वाटिका, 13 मार्च 2021, शनिवार, देहरादून। देवभूमि उत्तराखण्ड न केवल प्राकृतिक सम्पदाओं व सौन्दर्य का भंडारण है बल्कि अपनी विशेष प्राकृतिक विरासतों व यहॉं के वासियों के सरल, सौम्य स्वभाव व धार्मिक प्रवृति के लिए भी विशेष रूप से जाना है। देवभूमि उत्तराखण्ड, अपनी कला, संस्कृति व रहन-सहन के लिए देश ही नहीं विदेशों में भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। देवी-देवताओं, ऋषि-मुनियों ने भी देवभूमि को अपने वास व तप के लिए उपयुक्त समझा। प्राकृतिक छटा व मनोहारी सौन्दर्य को देखते ही ऐसा लगता है कि ‘पृथ्वी में यदि कहीं स्वर्ग है तो वह यही है।’

उत्तराखण्ड में मौसम के चक्र के अनुरूप, समय-समय पर विविन्न त्यौहार मनाये जाते हैं। प्रत्येक त्यौहार का प्रकृति व मौसम के साथ सीधा-सीधा सम्बन्ध है। यहाँ की प्राचीन सांस्कृतिक व पारम्परिक परम्परायें मुख्य रूप से धर्म व प्रकृति में निहित है। प्रत्येक त्यौहार में प्रकृति का कुछ न कुछ महत्त्व झलकता है।
ऋतुराज बसंत हर किसी के जीवन में नई उमंग लेकर आता है। बसंत ऋतु में ही पेड़ों पर नयी नयी खूबसूरत कलियाँ और डालियों पर तरह-तरह के मनमोहक फूल खिलते हैं। ऋतुराज बसंत के इसी उल्लास व उमंग को देवभूमि के प्रत्येक घर परिवार के साथ साझा करने की एक अनुपम पारम्परिक परंपरा कुमाऊँ व गढ़वाल क्षेत्र में पुरे महीने भर निभाई जाती है, जो फूलदेई (फूल सक्रांति) से शुरू होकर बैशाखी तक अनवरत चलती रहती है। उत्तराखंड की सांस्कृतिक, धार्मिक व लोक-परम्पराओं पर आधारित बाल-पर्व प्रत्येक बर्ष चैत्र मास के प्रथम दिवस (संक्रांति) को मनाया जाने वाला, एक अति महत्वपूर्ण व बसंत ऋतु के आगमन स्वागत का पर्व है – ”फूलदेई”
कुमाऊँ और गढ़वाल के ज्यादातर इलाकों में 8 दिनों तक यह त्यौहार मनाया जाता है लेकिन टिहरी के कुछ इलाकों में एक माह तक भी इस पर्व को मनाने की परंपरा है।

[box type=”shadow” ]“फूलदेई” से एक दिन पहले शाम को बच्चे रिंगाल की टोकरी लेकर फ्यूंली, बुरांस, बासिंग, आडू, पुलम, खुबानी के फूलों को इकट्ठा करते हैं। अगले दिन सुबह नहा-धोकर वह घर-घर जाकर लोगों की सुख-समृद्धि के लिए पारंपरिक गीत गाते हुए, देहरियों में फूल बिखेरते हैं। इस अवसर पर कुमाऊँ के में घरों देहरियों में ऐपण बनाने की परंपरा भी है।

‘फूलदेई, छम्मा देई,
दैणी द्वार, भरी भकार’
घोघा माता फुल्यां फूल,
दे-दे माई दाल चौंल’

फूलदेई के दौरान घर की देहरी पर फूल डालने आये नन्हें व प्यारे बच्चों को लोग उपहार स्वरुप दाल, चावल, आटा, गुड़, घी और दक्षिणा दान करते हैं। पूरे माह में यह सब जमा किया जाता है। इसके बाद घोघा देवी की पुजा की जाती है। चावल, गुड़, तेल से मीठा भात बनाकर प्रसाद के रूप में सबको बांटा जाता है। कुछ क्षेत्रों में बच्चे घोघा की डोली बनाकर देव डोलियों की तरह घुमाते हैं। अंतिम दिन उसका पूजन किया जाता है।[/box]

आधुनिकता के इस दौर में प्रकृति व मानव के बीच स्नेह के प्रतिक त्यौहारों का महत्त्व धीरे-धीरे कम होता जा रहा है, जो शुभ संकेत नहीं है। हमें अपने पूर्वजों द्वारा प्रदत्त रीति-रिवाजों, तीज-त्यौहारों का मन से सम्मान करना चाहिए तथा जीवन के लिए इनकी जरूरत को समझते हुए आपसी भाईचारे के साथ मिलजुल कर अपने लोक-पर्वों को मानना चाहिए, तभी हमारी भावी पीढ़ी भी संस्कारवान बनेगी।

[highlight]आकाश ज्ञान वाटिका परिवार की ओर से ‘देवभूमि उत्तराखण्ड की संस्कृति का संवाहक, प्रकृति एवं मानव के बीच प्रेम व पारस्परिक सम्बंधों का प्रतीक, बाल लोक पर्व फूलदेई/फूल संक्रांति’ की समस्त सम्मानित, स्नेही जनों को हार्दिक शुभकामनायें एवं बहुत बहुत बधाई।[/highlight]

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Ghanshyam Chandra

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