Breaking News :
>>कैसी होगी खेल नीति, जनता देगी राय- रेखा आर्या>>संवेदनशील क्षेत्रों का दौरा कर कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने सुरक्षात्मक कार्यों का लिया जायजा>>मुख्य सचिव ने केदारनाथ पुनर्निर्माण एवं बद्रीनाथ मास्टर प्लान कार्यों की समीक्षा की>>ऑपरेशन प्रहार के तहत दून पुलिस की बड़ी कार्रवाई, 13.80 लाख की स्मैक के साथ दो तस्कर गिरफ्तार>>वात्सल्य योजना के तहत 4 करोड़ 39 लाख रुपए लाभार्थियों के खातों में ट्रांसफर>>देश-दुनिया में बसे उत्तराखंडवासी राज्य के सबसे बड़े सांस्कृतिक दूत और ब्रांड एंबेसडर- धामी>>जिम्बाब्वे के खिलाफ टी20 सीरीज के लिए टीम इंडिया का ऐलान, चार नए खिलाडी स्क्वाड में शामिल>>समाधान दिवस में डीएम का सख्त एक्शन, आंचल डेयरी प्रबंधक का रोका वेतन>>उदीयमान खिलाड़ी उन्नयन योजना के चयन ट्रायल 14 जुलाई से- रेखा आर्या>>देहरादून की तस्वीर बदलने वाली महायोजना पर जनता की मुहर>>ऋषिकेश में नशा रोकने पर माँ को गोली मारने की घटना से स्तब्ध महिला आयोग>>जनता मिलन में 21 शिकायतों पर डीएम सख्त, समयबद्ध एवं संतोषजनक निस्तारण के दिए निर्देश>>आरोपियों से जुड़े लोगों को जांच समिति में शामिल करना गलत- गोदियाल>>तीन दिन में पोर्टल पर प्रोजेक्ट अपलोड करें विभाग- मुख्य सचिव>>मानसून में दही खाना सही है या नहीं? जानिए क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ>>सेवा पखवाड़ा सरकार और जनता के बीच भरोसे का सेतु- महाराज>>वीकेंड पर ‘अल्फा’ की कमाई में आया उछाल, फिल्म ने तीन दिन में कमाए इतने करोड़ रुपये>>महाराज ने पोखड़ा में ₹60 लाख की लागत से निर्मित आवासीय भवन का किया लोकार्पण>>कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी से मिले लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) अजय कुमार सिंह>>सीएम धामी ने रामनगर में ₹29.65 करोड़ की लागत से नवनिर्मित धनगढ़ी पुल का किया लोकार्पण
उत्तराखण्डताज़ा खबरेंराजनैतिक-गतिविधियाँ

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के लिए बाकी हैं आठ माह : मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक के चेहरे बदले जाने की हैं चर्चायें

आकाश ज्ञान वाटिका, 9 जून 2021, बुधवार, देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव को अब आठ महीने ही बाकी हैं। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस, दोनों दलों के भीतर भावी मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर चिक-चिक चल पड़ी है। फर्क इतना है कि भाजपा में यह सब चुपके-चुपके हो रहा है, जबकि कांग्रेस में खुलेआम। कांग्रेस में कलाकार मंच पर हैं, तो भाजपा में पर्दे के पीछे। भाजपा में चुनावी चेहरे का शिगूफा छोड़ने वाले तीन किस्म के लोग हैं। पहले तो वे जिन्हें अपने चेहरे की बनावट और जनता में इसकी खिंचावट पर जरूरत से ज्यादा भरोसा है। दूसरे वे लोग हैं जिन्हें चुनावी साल में त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाकर तीरथ सिंह रावत को लाना नागवारा गुजरा। तीसरे वे लोग हैं जिन्हें चार साल बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत की जगह तीरथ सिंह रावत को लाने का औचित्य समझ में नहीं आया। यानी दोनों में गुणात्मक अंतर नहीं समझ पा रहे हैं। कुल मिलाकर तीसरी श्रेणी के लोगों की सोच व्यक्तिगत से ज्यादा सांगठनिक लग रही है।

अब सवाल यह उठता है कि चुनावी साल में तीरथ सिंह रावत को सरकार की बागडोर सौंपने का सीधा अर्थ यह नहीं है कि अगले चुनाव का चेहरा तीरथ ही होंगे। वैसे भी मुख्यमंत्री ही चुनाव में किसी भी सत्ताधारी पार्टी का स्वाभाविक चेहरा होता है। तीरथ के शुभाकांक्षी तो यह कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें मौका ही कहां मिला कुछ करने का। आते ही कुंभ और फिर प्रदेश में कोरोना की दूसरी लहर के प्रकोप से जूझते रहे। कोरोना पर काबू पाने के बाद अब वह कुछ कर दिखाएंगे। संगठन से यह चिंता भी उठ रही है कि अब कुछ कर दिखाने के लिए कितना समय बचा है और कितना बजट। चुनावी चेहरे की आवाज को पूरी तरह से असंतुष्टों की शरारत कह कर खारिज भी नहीं किया जा सकता है। इसके पीछे बेशक कुछ की महत्वाकांक्षा होगी, लेकिन कुछ जमीनी कारक भी काम कर रहे हैं। यह भी माना जा रहा है कि भाजपा के असम प्रयोग के बाद उत्तराखंड में पार्टी के अंदर और बाहर इस तरह के विमर्श ने जन्म लिया। भाजपा में समाहित कांग्रेसी धड़े के दिग्गजों की महत्वाकांक्षा को भी असम प्रयोग से पर लगे हैं। कांग्रेस में चेहरे की लड़ाई नई नहीं है। विधानसभा चुनाव में उतरने से पहले भावी मुख्यमंत्री का चेहरा जनता को बता देना चाहिए, कांग्रेस में यह खुली और नेक राय रखने वाले नेता कोई और नहीं, बल्कि पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव एवं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत (हरदा) तथा उनके समर्थक हैं। प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति ने हरीश रावत को बुढ़ापे में इतना बहादुर बना दिया कि वह प्रदेश संगठन और हाईकमान की इच्छा के विपरीत चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने की ताल ठोंक रहे हैं। पार्टी में उनके चाहने वालों का दावा है कि राज्य में मुख्यमंत्री के लिए उनसे बेहतर कोई और चेहरा नहीं है। प्रत्याशियों को जिताने का दमखम उनसे ज्यादा किसी के पास नहीं।

हालांकि वह स्वयं मुख्यमंत्री रहते हुए भी दो सीटों से विधायकी का चुनाव हार कर उत्तराखंड सियासत में अनोखी मिसाल बन चुके हैं। उनके समर्थकों का मानना है कि पहले भी दो बार हरदा के साथ धोखा हुआ। राज्य का पहला विधानसभा चुनाव उनके ही कंधे पर लड़ा गया, लेकिन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी को बना दिया गया। तीसरे विधानसभा चुनाव में भी हरदा ही सर्वाधिक विधायक जिता कर लाए, लेकिन मुख्यमंत्री बना दिया गया विजय बहुगुणा को। उस बार वह समर्थक विधायकों के साथ दिल्ली में कोपभवन में चले गए थे। दोनों बार अधिकांश विधायक उनके लिए अड़े थे, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी नसीब नहीं हुई। इस बार वह पहले ही पत्ते खुलवाना चाहते हैं। मुख्यमंत्री का चेहरा जनता को बताओ और चुनाव लड़ो। पिछले तजुर्बे को देखते हुए उम्र के इस पड़ाव में वह तीसरी बार किसी तिवारी या बहुगुणा के लिए कुर्सी सजाने के मूड में कतई नहीं हैं।

Loading

Ghanshyam Chandra

AKASH GYAN VATIKA (www.akashgyanvatika.com) is one of the leading and fastest growing web News Portal which provides latest information about the Political, Social Activities, Environmental, entertainment, sports, General Awareness etc. I, GHANSHYAM CHANDRA, EDITOR, AKASH GYAN VATIKA provide News and Articles about the abovementioned subject and also provide latest/current state/national/international News on various subject.
error: Content is protected !!