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उत्तराखण्ड

उत्तराखंड पुलिस के निलंबित सिपाही शेर सिंह के तथाकथित “इस्तीफे” को लेकर उठे सवाल

आईजी कुमाऊं निवेदिता कुकरेती ने बताया कि सस्पेंड था कांस्टेबल, गैंगस्टर कनेक्शन पर STF ने की थी कार्रवाई

देहरादून- दिल्ली में चल रहे CJP के आंदोलन के दौरान उत्तराखंड पुलिस के लंबे समय से निलंबित चल रहे सिपाही शेर सिंह द्वारा मंच से तथाकथित “इस्तीफा” देने का प्रदर्शन चर्चा का विषय बना हुआ है। इस घटनाक्रम के बाद यह प्रश्न उठ रहे हैं कि जो व्यक्ति पिछले एक वर्ष से अधिक समय से निलंबित है और सक्रिय पुलिस सेवा में नहीं है, उसके द्वारा दिया गया यह तथाकथित इस्तीफा आखिर किस पद से है तथा इसका वास्तविक औचित्य क्या है।

आईजी कुमाऊं निवेदिता कुकरेती ने बताया कि कांस्टेबल 28 जून से पिथाैरागढ़ से अनुपस्थित था। इसके लिए उसे नोटिस दिया गया था। जिसके बाबद उसे 20 जुलाई को सस्पेंड कर दिया गया था। निलंबित कांस्टेबल का पहले भी आपराधिक इतिहास रहा है। इसका एक अन्य साथी प्रवीण बाल्मिकी जैसे कुख्यात के साथ मिलकर गतिविधियों में संलिप्त थे। लोगों को डरा धमकाकर लोगों की जमीन हड़पते थे। हरिद्वार में मामला भी दर्ज किया गया। ये कई महीने जेल भी रहा। इस संबंध में पहले से ही कार्रवाई चल रही थी। अब जिस तरह के आरोप कांस्टेबल द्वारा लगाए जा रहे हैं, इस पर वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।

उल्लेखनीय है कि शेर सिंह वर्ष 2025 से एक गंभीर आपराधिक प्रकरण में नामजद होने के बाद उत्तराखंड पुलिस से निलंबित चल रहा है। उसके विरुद्ध थाना गंगनहर, जनपद हरिद्वार में मु०अ०सं० 415/2025 के अंतर्गत भारतीय दंड संहिता की धाराओं 420, 467, 468, 471, 120-बी तथा भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 111(2)(बी), 351(2) एवं 352 के तहत मुकदमा पंजीकृत किया गया था।

जांच में यह तथ्य सामने आए कि हरिद्वार-रुड़की क्षेत्र के कुख्यात गैंगस्टर प्रवीण वाल्मीकि, जिसके विरुद्ध हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, अवैध वसूली तथा भूमि पर अवैध कब्जे सहित अनेक गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं और जो वर्तमान में जेल में निरुद्ध है, द्वारा संचालित आपराधिक गिरोह में शेर सिंह की भी सक्रिय भूमिका पाई गई। आरोप है कि शेर सिंह ने मनीष बॉलर, हसन अब्बास जैदी एवं अन्य आरोपियों के साथ मिलकर स्थानीय लोगों को डराकर उनकी भूमि पर अवैध कब्जा करने तथा उससे आर्थिक लाभ अर्जित करने में सहयोग किया।

जांच के अनुसार, रुड़की निवासी एक विधवा महिला एवं उसके परिवार को गैंग द्वारा लगातार धमकाया गया। आरोप है कि पीड़िता के भाई एवं देवर पर पहले गैंग द्वारा गोलीबारी की गई, जिसके बाद भयवश पीड़िता अपने बच्चों सहित अन्य स्थान पर रहने चली गई। इसी दौरान उसकी भूमि पर अवैध कब्जा कर उसे फर्जी तरीके से बेच दिया गया।

प्रकरण में यह भी सामने आया कि उस समय उत्तराखंड पुलिस में कॉन्स्टेबल के पद पर तैनात शेर सिंह ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए कुख्यात अपराधी प्रवीण वाल्मीकि से सितारगंज जेल एवं रुड़की न्यायालय में कई बार मुलाकात की तथा पीड़िता एवं उसके परिवार को मुकदमा वापस लेने के लिए धमकाने का प्रयास किया। आरोप है कि न्यायालय में पेशी के दौरान भी पीड़िता को अपराधी के सामने ले जाकर डराया-धमकाया गया तथा गैंग के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर विवादित भूमि के अवैध सौदे से लाभ अर्जित किया गया।

प्रकरण में पर्याप्त साक्ष्य मिलने के उपरांत शेर सिंह को दिनांक 15 सितंबर 2025 को गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजा गया था। बाद में उसे 7 नवंबर 2025 को माननीय उच्च न्यायालय, नैनीताल से जमानत प्राप्त हुई। गिरफ्तारी के उपरांत विभागीय कार्रवाई करते हुए उसे तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया था और वह तब से सक्रिय पुलिस सेवा में नहीं है।

ऐसी स्थिति में दिल्ली के आंदोलन के मंच से तथाकथित “इस्तीफा” देने की घोषणा को लेकर स्वाभाविक रूप से अनेक प्रश्न उठ रहे हैं। चर्चा का विषय यह है कि लंबे समय से निलंबित एवं सक्रिय सेवा से बाहर चल रहे व्यक्ति द्वारा इस प्रकार का सार्वजनिक प्रदर्शन वास्तविक त्यागपत्र है या केवल जनभावनाओं एवं मीडिया का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास।

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Ghanshyam Chandra

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