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49 हस्तियों ने पीएम नरेंद्र मोदी को लिखा लेटर

भीड़ की हिंसा पर अनुराग कश्यप समेत 49 हस्तियों ने पीएम नरेंद्र मोदी को लिखा लेटर

नई दिल्‍ली, भीड़ की हिंसा पिछले कुछ समय से लोगों के साथ-साथ राज्‍य सरकारों के लिए भी चिंता विषय बना हुआ है। लगातार हो रही ऐसी घटनाओं पर चिंता व्‍यक्‍त करते हुए फिल्‍म और अन्‍य जगत की 49 हस्तियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। पीएम मोदी को लिखे लेटर में रामचंद्र गुहा, अनुराग कश्यप, मणिरत्नम, अदूर गोपालकृष्णन, अपर्णा सेन और श्‍याम बेनेगल जैसी हस्तियों के हस्ताक्षर हैं। इन सभी लोकप्रिय लोगों ने पीएम मोदी से एक ऐसा माहौल बनाने की मांग की है, जहां असंतोष को दबाया नहीं जाए।

यह सोचना जरूरी है कि लगभग डेढ़ साल तक चली सरकार ने यहां तक पहुंचने के लिए कितना समझौता किया होगा। पर यह कहना उचित नहीं होगा कि ड्रामा खत्म हो गया। अभी एक पार्ट खत्म हुआ है, अब देखना है कि आगे की राजनीति किस करवट बैठती है। क्या भाजपा सरकार बनाने की कोशिश करेगी? भाजपा नेता बीएस येद्दयुरप्पा क्या आखिरी पारी खेल पाएंगे? गेंद राज्यपाल के पाले में है और काफी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ी जानी है

राजनीतिक विश्लेषक सुरेंद्र किशोर का कहना है कि भीड़ की हिंसा के मामले जातीय और सांप्रदायिक उन्माद के कारण भी सामने आ रहे हैैं, लेकिन यह कहना कतई सही नहीं कि सिर्फ अल्पसंख्यक ऐसी हिंसा के निशाने पर हैं। इसका कोई तथ्यात्मक आधार भी नहीं है। देश भर से आ रही खबरों से यह साफ है कि लगभग हर समुदाय और वर्ग के लोग भीड़ की हिंसा के शिकार हो रहे हैं। इसका प्रमाण हाल की उन घटनाओं से मिलता है जो बीते दिनों में बिहार और झारखंड में घटीं। बिहार में तीन मवेशी चोर भीड़ के हाथों मारे गए और झारखंड में डायन होने के शक में चार लोग। राजनीतिक और अन्य कारणों से शोर एकतरफा जरूर हो रहा है।

सुरेंद्र किशोर बताते हैं कि भीड़ की हिंसा पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार कड़े कानून बनाने की तैयारी में है। यह जरूरी भी है, लेकिन आपराधिक न्याय व्यवस्था में सुधार के बिना किसी कानून की सफलता सीमित ही रहेगी। जिस देश में औसतन सिर्फ 45 प्रतिशत आरोपितों को ही अदालतों से सजा मिल पाती हो वहां अपराधियों का मनोबल बढ़ना ही है। क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को सुधारने के लिए सर्वाधिक जरूरत इस बात की है कि सजाओं का प्रतिशत बढ़ाने के कारगर उपाय तत्काल किए जाएं। अमेरिका की 93 प्रतिशत और जापान की 98 प्रतिशत सजा दर को थोड़ी देर के लिए छोड़ भी दें तो अपने ही देश के विभिन्न राज्यों में सजा दर में भारी अंतर क्यों है? क्यों केरल में सजा दर 77 है तो बिहार और बंगाल में क्रमश: 10 और 11? क्या इन आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करके हमारे शासकों ने कोई सबक सीखने की कभी कोशिश की है? इसी देश की विभिन्न जांच एजेंसियों के मामलों में भी सजा दर में भारी अंतर है?

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Ghanshyam Chandra

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