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सम्पादकीय

शिक्षा में सुसंस्कारों का समावेश जरूरी

शिक्षा में सुसंस्कारों का समावेश जरूरी है।
देश का भविश्य शिक्षित समाज पर ही टिका है। शिक्षा के क्षेत्र में देश ने काफी प्रगति की है। सर्वशिक्षा अभियान, प्रौढ शिक्ष आदि अनेकों योजनाओं के माध्यम से देश में शिक्षा का अनुपात काफी बढ़ा है। लेकिन इस बात को समझने की जरूरत है कि शिक्षा के अनुपात में वृद्धि से ज्यादा आवश्यकता है शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने की। प्राचीन काल में शिक्षा का अनुपात काफी कम था लेकिन समाज में जो भी लोग शिक्षित थे उन्होंने सामाजिक व्यवस्था को आज के मुकाबले काफी अधिक स्वच्छ व बेदाग रखा था। बडे़-बडे़ महापुरूष व विद्वान हुये। किसी वर्ग, स्तर व जाति-धर्म के आधार पर शिक्षा को नहीं देखा जाता था। भारत के गौरव, ‘मिसाइल मैन‘ के नाम से विख्यात, पूर्व राष्ट्रपति डॉ॰ एपी जे अब्दुल कलाम एक साधारण परिवार से निकलकर आये और पूरे विश्व में हिन्दुस्तान का गौरव बढ़ाया। आज तो शिक्षा की अपार सुविधायें उपलब्ध हैं। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर विद्यालय खुले हैं। गांव, शहर व महानगर हर जगह शिक्षण संस्थानों की भरमार है, लेकिन सामाजिक स्तर गुणवत्ता पहले से काफी गिर गई है। देश की पहली सीढ़ी हमारा समाज है, जिस तरह लोगों के समूह से समाज की संरचना होती है, ठीक उसी प्रकार समाज के बृहत समूह को राष्ट्र कहा जाता है। इसलिये यह तय है कि सामाजिक गलियारों से होकर ही राष्ट्र के विकास का रास्ता गुजरता है। स्वच्छ समाज के लिये शिक्षा जितनी आवश्यक है, उससे कही ज्यादा शिक्षा में सुसंस्कारों का समावेश जरूरी है। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य सामाजिक गतिविधियों को अपनी संस्कृति के अनुरूप गति देना है। एक बच्चा जब इस संसार में जन्म लेता है तो वह अंजान होता है तथा उसके आस-पास के वातावरण के अनुरूप ही उसका मानसिक व शारीरिक विकास होता है। माता-पिता ही बच्चे को संस्कारों में ढालने की कोशिश करते हैं। घर बालक की प्रथम पाठशाला होती है। यहॉ से अच्छे संस्कारों को लेकर यह बालक जब स्कूल में प्रवेश करता है तो उसे एक मिश्रित वातावरण व सामाजिक परिवेश वहॉ मिलता है। बच्चा बडी उत्सुकता के साथ उसे ग्रहण करने लगता है। ऐसे समय में स्कूल का वातावरण सुसंस्कारिक व स्वच्छ होना आवश्यक है। आज शिक्षा का स्तर काफी गिरता जा रहा है। शिक्षा में संस्कारों का अभाव होना, आज समाज के लिये घातक है, जिसके दूरगामी परिणाम काफी खतरनाक होंगे, क्योंकि देश के हर क्षेत्र में कार्य करने वाले व्यक्ति शिक्षण संस्थानों से आते हैं। जैसा माहौल व वातावरण उन्हें इस दौरान मिलता है, उसका असर उसकी कार्यशैली पर पड़ता है। आज शिक्षा का क्षेत्र देखें या राजनीति का, हर क्षेत्र में परिवर्तन नजर आ रहा है। शिक्षक छात्र के बीच जो सम्बन्ध होते थे, आज बदलते परिवेश में ये रिश्ते भी संस्कारविहीन हो गये हैं। राजनेताओं का राजधर्म होता था स्वराष्ट्र की सेवा, इसीलिये तो हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने राष्ट्र धर्म को निभाते हुये आजादी के लिये अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे। लेकिन राष्ट्र का मंदिर कहा जाने वाले संसद, व विधान सभाओं में जो स्वरूप् राजनीति का देखने का मिलता है, उससे स्पष्ट होता है कि कहीं न कहीं हमारी शिक्षा प्रणाली ही संस्कारविहीन होती जा रही है। एक छात्र जब शिक्षण संस्थान में प्रवेश पाता है तो उसे वरिष्ठ छात्रों द्वारा ड्रैस कोड कैसा हो, वरिष्ठ छात्रों से कैसे व्यवहार करें, ये बातें तो बताई जाती हैं तथा यह बहुत कम बताया जाता है कि गुरूजनों से कैसा व्यवहार किया जाय ? जबकि गुरू का महत्व अत्यधिक है। आज शिक्षा, दिशाविहीन हो गयी है। हाँ, शिक्षा का व्यवसायीकरण जरूर हो चुका है। इसी व्यवसायीकरण के चलते शिक्षा से संस्कार गायब हो चुके हैं।

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Ghanshyam Chandra

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