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खुशहाली एवं सुख-समृद्धि का प्रतीक उत्तराखंड का लोकपर्व “घी-संक्रांत (घी-त्यार) पर अवश्य खायें घी

आकाश ज्ञान वाटिका, 16 अगस्त 2020, रविवार। सूर्य का एक राशि से अलगी राशि में प्रवेश को संक्रान्ति के रूप में मनाया जाता है। उत्तराखण्ड में हिन्दी माह की प्रत्येक 1 (पहली) गते अर्थात संक्रान्ति को एक लोक पर्व के रुप में मनाने परम्परा चली आ रही है। इस दिन लोग प्रातः स्नान कर, व्रत रखकर पूजा अर्चना करते हैं। एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति की अवधि को सौर मास कहते हैं। वर्षभर में कुल 12 संक्रान्तियाँ होती हैं लेकिन इनमें से चार संक्रांति, मेष, कर्क, तुला, मकर संक्रांति महत्वपूर्ण हैं।

भाद्रपद मास की संक्रान्ति के दिन सूर्य सिंह राशि में प्रवेश करता है, इसी कारण इसे सिंह संक्रांति भी कहते हैं और इस दिन को उत्तराखंड, विशेष रूप से कुमाऊँ अंचल में घी-संक्रांत (घी-त्यार) के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सभी लोग अनिवार्य रूप से घी का सेवन अवश्य करते हैं और लोक मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस दिन घी का सेवन नहीं करता है उसे अगले जन्म में घोंघा (Snail) के रूप में जीवन मिलता है। घी के प्रयोग से शारीरिक और मानसिक शक्ति में वृद्धि होती है, अतः शरीर के विभिन्न अंगों में भी घी से मालिश की जाती है। विशेष रूप से छोटे बच्चों के सिर पर घी लगाया जाता है। .

यह ऋतु पर आधारित त्यौहार है तथा उत्तराखंड में घी-संक्रांत या ओलगिया संक्रांति कृषि और पशुपालन से जुड़ा हुआ, एक लोक पर्व है। घी-त्यौहार फसलों में बालियों के लग जाने पर मनाया जाने वाला त्यौहार है। इन दिनों बरसात के मौसम में उगाई जाने वाली फसलों में बालियाँ आने लगती हैं तथा किसान अच्छी फसलों की कामना करते हुए घी-संक्रांति पर ख़ुशी मनाते हैं। फसल की बालियों को घर के मुख्य दरवाज़े के ऊपर गोबर से चिपकाया जाता है।

घी-संक्रांत या ओलगिया संक्रांति के दिन का मुख्य व्यंजन बेडू रोटी है। उरद की दाल भिगाकर पीसने के बाद पिट्ठी से भरवाँ रोटी बनाई जाती है इसी को बेडू रोटी (रोट) कहते हैं। बेडू रोटी को घी में डुबोकर खाई जाती है। अरबी के गाबा (कोमल पत्ते) की सब्जी बनाई जाती है।

[box type=”shadow” ]ओल्गी क्या है ?

घी-संक्रांत मुख्यतः कृषि और पशुपालन से जुड़ा त्यौहार है। इस अवसर पर घी (घृत), खेतों में उगी ताजी सब्जियों, मौसमी फलों आदि को एक दूसरे को भेंट करने की प्रथा भी प्रचलित है। इसके अतिरिक्त शिल्पकार, बढ़ई, लोहार एवं अन्य कास्तकार अपने हाथ की बनी वस्तुयें जैसे कढ़ाई, चिमटा, हल, दातुली, फावड़ा, कुल्हाड़ी आदि भेंट करते हैं और इसके बदले में उन्हें अनाज, रूपये, कपड़े आदि दिया जाता है। उपहार देने की यह प्रथा ओल्गी कहलाती है। घी-संक्रांति में ओल्गी प्रथा के प्रचलन के कारण ही इसे ओलगिया संक्रांति भी कहते हैं।[/box]

[box type=”shadow” ]वर्ष 2020 संक्रान्ति-तिथि:
15 जनवरी 2020, बुधवार       –        मकर संक्रांति
13 फ़रवरी 2020, गुरुवार      –        कुम्भ संक्रांति
14 मार्च 2020, शनिवार         –        मीन संक्रांति
13 अप्रैल 2020, सोमवार       –        मेष संक्रांति
14 मई 2020, गुरुवार            –        वृष संक्रांति
14 जून 2020, रविवार            –       मिथुन संक्रांति
16 जुलाई 2020, गुरुवार        –        कर्क संक्रांति
16 अगस्त 2020, रविवार       –        सिंह संक्रांति, घी-संक्रांत
16 सितम्बर 2020, बुधवार     –        कन्या संक्रांति
17अक्टूबर 2020, शनिवार     –        तुला संक्रांति
16 नवम्बर 2020, सोमवार     –        वृश्चिक संक्रांति
15 दिसम्बर 2020, मंगलवार  –        धनु संक्रांति[/box]

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Ghanshyam Chandra

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