मैं हिंदी हूँ……….

साभार : शोभा पांडे “शोभन“, देहरादून

मैं हिंदी हूँ ।
मेरे अपने स्वर- व्यंजन हैं ।
स्वरों में मात्रायें भी निहित हैं।
स्वर+व्यंजनों से, निर्मित शब्द,
सामर्थ्य रखते हैं, नव-निर्माण का।।
संस्कृत भाषा की मैं आत्मजा ,
नवरस, नव-भावों से युक्त हूँ ।
वर्ण, शब्दों से रंगी हूँ मैं,
व्याकरण से भी अलंकृत हूँ ।
अल्पविराम, अर्धविराम, पूर्ण विराम,
विसर्ग, हलंत, आभूषणों से सजी हूँ मैं।
प्रश्नवाचक चिन्ह , विस्मयादिबोधक चिन्ह,
उद्धरण चिन्ह, योजकचिन्ह,
निर्देशक चिन्ह और लोपाचिन्ह,
सभी मेरी शोभा बढ़ाते हैं।।
मुझ में ही साहित्य उपजता,
कविता, कहानी, निबंध है रचता।
मनोभावों का अर्थ-रस निर्झरता,
नृत्य, गीत की माध्यम हूँ।
छंद, दोहे, चौपाई, सोरठा, मुहावरों,
लोकोक्तियों से सजी हूँ मैं।।
गंगा की धारा सी निर्मल,
अविरल प्रवाह, जग में मेरा।
भारतवासी और प्रवासी,
सबके कंठ में है वास मेरा ।
विश्व की अन्य भाषाओं के,
शब्दों को संग ले चलती हूँ।।
धरा-गगन के भेद खोलती,
अभिव्यक्ति का साधन हूँ।।
परम ज्ञान प्रकाशक हूँ मैं,
ब्रह्म ज्ञान की दायक हूँ।
आन, बान, शान भारत की,
प्रभावशाली विरासत हूँ।
भारत माँ का आभामंडल,
और माथे की बिंदी हूँ।
मैं संस्कृति, संस्कारों की संवाहक,
समप्रेषक, परिचायक हूँ।
विश्व की सशक्त भाषाओं में,
तीसरे (३) क्रम पर स्थित हूँ।
१४ सितम्बर सन् १९४९ से,
भारत की आधिकारिक भाषा,
राजभाषा कहलाती हूँ।
देश की समृद्धि, उन्नति हेतु,
अपना दायित्व निभाती हूँ।
अंतर्राष्ट्रीय संचार की भाषा हूँ मैं,
भावनाओं की भाषा कही जाती हूँ।
मेरी उदारता, सरलता, सुगमता,
और सहजता सबको भाती है।
इसी लिए, सन् १९५३ से प्रतिवर्ष,
१४ सितम्बर को, भारत की जनता,
राष्ट्रीय हिंदी दिवस मनाती है।
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