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“धर्म के नाम पर कितना खून बहाया गया, उसका कोई हिसाब नहीं” : राजनाथ सिंह

आकाश ज्ञान वाटका, 27 अक्टूबर 2022, गुरुवार, श्रीनगर। कश्मीरियत के नाम पर आतंकवाद का जो तांडव इस प्रदेश ने देखा, उसका कोई वर्णन नहीं किया जा सकता है। धर्म के नाम पर कितना खून बहाया गया, उसका कोई हिसाब नहीं। आतंकी तो बस हिंदुस्तान को लक्ष्य करके अपने मंसूबों को अंजाम देना जानते हैं।

आज शौर्य दिवस पर बड़गाम में आयोजित सैन्य कार्यक्रम में संबोधित करते हुए रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आज भारत की जो एक विशाल इमारत हमें दिखाई दे रही है, वह हमारे वीर योद्धाओं के बलिदान की नींव पर ही टिकी हुई है। भारत नाम का यह विशाल वटवृक्ष, उन्हीं वीर जवानों के खून और पसीने से अभिसिंचित है। आज का यह शौर्य दिवस, उन वीर सेनानियों की कुर्बानियों और बलिदान को ही याद करने का दिवस है। आज का यह दिवस, उनके त्याग और समर्पण को हृदय से नमन करने का दिवस है।

26 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ विलय समझौता होते ही अगले दिन 27 अक्टूबर 1947 को भारतीय सेना लोगों की सुरक्षा के लिए कश्मीर की धरती पर पहुंच गई। सेना का यह अभियान हमारी क्षेत्रीय अखंडता की सुरक्षा के साथ-साथ, हमारी जनता की सुरक्षा का भी अभियान था। यह आजाद भारत को लेकर, यहां की जनता के सपनों, आशाओं और आकांक्षाओं को सुरक्षित करने का अभियान था। इस युद्ध में भारतीय सेना ने कश्मीरी भाइयों-बहनों और सुरक्षाबलों के सहयोग से ऐसा ऐतिहासिक काम किया, कि उसकी जितनी सराहना की जाए, कम है। हमारी सेनाओं ने दुश्मनों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया, और जम्मू-कश्मीर समेत पूरे देश की संप्रभुता की सुरक्षा की।

भारत पाकिस्तान बटवारे का जिक्र करते हुए रक्षामंत्री राजनाथ सिंह बोले 1947 में भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन की कथा लिखी गई। इस कथा की रक्तिम स्याही अभी सूखी भी न थी, कि पाकिस्तान द्वारा विश्वासघात की एक नई पटकथा लिखी जानी शुरू हो गई थी। विभाजन के कुछ ही दिनों के भीतर पाकिस्तान का जो चरित्र सामने आया, उसकी कभी कल्पना भी नहीं की गई थी।

मैं भारतीय राजनीति के एक शिखर पुरूष, और ओड़िशा के पूर्व मुख्यमंत्री, बीजू पटनायक का भी स्मरण, और उनको नमन करना चाहूँगा : रक्षामंत्री राजनाथ सिं  

यहाँ मैं भारतीय राजनीति के एक शिखर पुरूष, और ओड़िशा के पूर्व मुख्यमंत्री, बीजू पटनायक का भी स्मरण, और उनको नमन करना चाहूँगा। वे एक कुशल पायलट थे, और इस युद्ध में हमारी सेनाओं को शीघ्र यहां पहुंचाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था। मेजर सोमनाथ शर्मा ने इस अभियान में अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। पर उनकी स्मृति आज भी न केवल हमारी सेनाओं, बल्कि देश के युवाओं में देशभक्ति का ज्वार भर देती है। मेजर शर्मा, सदैव हमारे लिए प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे। हम उनके प्रति सदैव कृतज्ञ रहेंगे। विपरीत परिस्थितियों में भी अपना हौंसला बनाए रखते हुए, हमारी सेनाएँ एक-एक करके दुश्मनों का निपटारा कर रही थीं। उनके शौर्य के सामने दुश्मनों की एक-एक चालें नेस्तनाबूत हो रही थीं। इस दौरान हमारी सेना के अनेक जाँबाज अधिकारी और सिपाहियों ने हँसते-हँसते अपने प्राणों की आहुति दे दी।

एक ही राष्ट्र में ‘दो विधान, दो निशान और दो प्रधान’ कार्य कर रहे थे

आज़ादी के बाद से ही, धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला यह प्रदेश, कुछ स्वार्थपूर्ण राजनीति की भेंट चढ़ गया, और एक सामान्य जीवन जीने के लिए तरस गया था। इसी स्वार्थपूर्ण राजनीति के चलते, पूरे प्रांत को लंबे समय तक अंधेरे में रख दिया गया। देश का एक अभिन्न अंग होने के बाद भी, जम्मू और कश्मीर के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जा रहा था। एक ही राष्ट्र में ‘दो विधान, दो निशान और दो प्रधान’ कार्य कर रहे थे। भारत सरकार की अनेक कल्याणकारी योजनाएँ, दिल्ली से चलती थीं, पर पंजाब और हिमाचल की सीमा तक आते-आते रुक जाती थी।

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Ghanshyam Chandra

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