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पितृपक्ष : संस्कार, श्रद्धा और सेवा का पर्व

आकाश ज्ञान वाटिका, बुधवार, 30 सितम्बर 2026, देहरादून।
साभार : शोभा पांडे “शोभन”
देहरादून
पितृपक्ष की आई बेला,
मन में श्रद्धा है लायी।
अद्यतन जन के मन-मानस में,
पितृ स्मृति ही है छायी।
विप्र आमंत्रित, तर्पण करते,
कपिला, काग, श्वान पूजते।
सांस्कृतिक पकवान हैं बनते,
दीन-दुखियों को पोषित करते।
नदी, तीर्थ, जलाशय के तटों पर,
सर्वहिताय श्राद्ध हैं करते।
आत्ममुक्ति पितृलोक पधार के,
पितर प्रसन्न आशीषें देते।
श्राद्ध कर्म, अनुष्ठान नहीं,
आभार जताने का है माध्यम।
नश्वर काया मिल गई प्रकृति में,
है बोध कराने का अनुपम साधन।
जीव नित्य, निराकार, अगोचर,
है ये स्मृति कराते श्राद्ध।
पूर्वजों के योगदान स्मृति हित,
कृतज्ञता व्यक्त हेतु हैं श्राद्ध ।
जग में मानुष का भाव प्रबल है,
शांति युक्त शोभन जीवन हो।
हे पितृदेव ! सृष्टि में चहुँ-दिसि,
सुख, सौभाग्य, आरोग्य निहित हो।

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