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उत्तराखण्ड

हरि के द्वार में गंगा बीमार, सिस्टम लाचार; दावे बेशुमार

हरिद्वार: हरि के द्वार हरिद्वार में गंगा बीमार है और सिस्टम लाचार। बावजूद इसके गंगा सफाई के दावे हजार हैं पर जमीनी हकीकत, इससे इतर है। गंगा तीर्थ हरिद्वार में गंगा को आज भी 24 नालों की गंदगी सिरे से गंदा कर रही है, इसमें सीवरेज जल की भी भरपूर मात्रा शामिल है। यहां रोजाना करीब 10 करोड़ लीटर गंदा पानी सीधे गंगा में बहाया जा रहा है, इतना ही नहीं यहां की औद्योगिक इकाइयां अपने औद्योगिक कचरे सहित केमिकल युक्त पानी भी खुलेआम गंगा में बहा उसे प्रदूषित कर रही हैं।

यही वजह है कि विशेषज्ञों की नजर गंगा तीर्थ हरिद्वार में कई जगहों पर गंगा जल पीने योग्य तो दूर नहाने के काबिल तक नहीं रह गया है। गंगा की सफाई को लेकर विभागीय और प्रशासनिक गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नमामि गंगे परियोजना के तहत सीवरेज लाइन, एसटीपी और पम्पिंग निर्माण सहित किसी भी योजना के क्रियान्वयन तो दूर चार वर्षों में उसका निर्माण तक पूरा नहीं कराया जा सका।

राज्य निर्माण के बाद पिछले 18 वर्षों में विभिन्न मदों और कुंभ व अर्द्धकुंभ में होने वाले विकास कार्यों के दौरान 1200 करोड़ खर्च करके भी प्रशासन हरिद्वार में 24 नालों से निकलने वाले 50 एमएलडी गंदे पानी को सीधे गंगा में गिरने से आज तक नहीं रोक सका। हालांकि, दावा इन 22 में से 15 नालों को पूरी तरह टैप करने और 2 को आंशिक रूप से टैप करने का है। पर, हकीकत में यह कागजी झूठ के अलावा कुछ नहीं है। क्योंकि इस बात का किसी के पास कोई जवाब नहीं कि टैप किए नालों का पानी कहां जा रहा है। कारण, हरिद्वार में शहरी क्षेत्र से रोजाना निकलने वाले तकरीबन 120 एमएलडी (मिलीयन लीटर डेली) सीवरेज जल के शोधन के लिए लगी तीन एसटीपी (सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट) की कुल क्षमता महज 63 एमएलडी ही है। ऐसे में वह अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करने के बावजूद निकलने वाले कुल सीवरेज का 57 एमएलडी जल का ही शोधन नहीं कर पाती तो नालों के पानी को कैसे साफ कर सकेगी।

इन सरकारी आंकड़ों से साफ है कि रोजाना 57 एमएलडी सीवरेज जल के साथ 50 एमएलडी ड्रैनेज जल को बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे गंगा में डाला जा रहा है। अकेले हरिद्वार में रोजाना 100 एमएलडी यानि 10 करोड़ लीटर से अधिक गंदा पानी सीधे गंगा में बहाया जा रहा है। यही वजह है कि प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड (पीसीबी) के आंकड़ों के अनुसार हरिद्वार में सर्वानंद घाट के अलावा कहीं भी गंगा का पानी पीने योग्य नहीं है। सर्वानंद घाट पर भी यह पानी गंगा की मुख्यधारा के मिलन बिंदु पर ही स्वच्छ है, यहां से आगे बढ़ते ही इसका प्रदूषित होना शुरु हो जाता है। यहां से आगे बढ़ने पर गंगा के पानी में ‘फीकल कॉलीफार्म’ की मात्रा बढ़ने लगती है, जबकि नदी पानी की घुलनशील ऑक्सीजन लेवल (डीओ) की मात्रा घटने लगती है। फीकल कॉलीफार्म यानि गंगा के पानी में मल-मूत्र की मात्रा। यही वजह है कि विशेषज्ञ यहां गंगा के पानी को पीने से तो मना करते ही हैं, साथ ही नहाने आदि में भी स्वास्थ्य पर इसका प्रतिकूल असर पड़ने की चेतावनी दे इसके इस्तेमाल में सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।

नमामि गंगे परियोजना का एक भी काम नहीं हुआ पूरा, बेकार पड़ा 400 करोड़ का कूड़ा संयंत्र

हरिद्वार में गंगा की सफाई के लिए नमामि गंगे परियोजना के तहत मुख्य रूप से नए एसटीपी के निर्माण, पंम्पिंग स्टेशन का अपग्रेडेशन, नई सीवर लाइन बिछाना, आधुनिक कूड़ा संयंत्र का निर्माण और नाले-नालियों की टैपिंग का काम होना था। इनमें से एक भी काम अब तक पूरा नहीं हो सका है। पंम्पिंग स्टेशन के अपग्रेडेशन का काम तो अब तक शुरु थी नहीं हुआ, नए एसटीपी का निर्माण 30 फीसद तक ही हो पाया है, नालों की टैपिंग और नई सीवर लाइन बिछाने का काम भी आधे से अधिक अधूरा ही पड़ा है, जबकि तकरीबन 100 करोड़ की रकम नमामि परियोजना के तहत इन पर ब तक खर्च की जा चुकी है। सराय में 400 करोड़ की लागत से बना 200 मीट्रिक टन की क्षमता वाला आधुनिक कूड़ा संयंत्र अब तक चालू नहीं किया जा सका है।

खत्म नहीं हो सका खुले में शौच 

सरकार और प्रशासन चाहे कितने की दावे कर ले पर, हरिद्वार की जमीनी हकीकत यही है कि जिले में खुले में शौच को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका है। ग्रामीण इलाकों की बात तो दूर शहरी क्षेत्र की मलिन बस्तियों तक में खुले में शौच पूर्व की भांति अब तक जारी है। इसका खुलासा राष्ट्रीय सेवा योजना के तहत जय भारत साधु महाविद्यालय श्रवणनाथनगर के विद्यार्थियों के किए गए सर्वेक्षण में हुआ, हालांकि मुख्य विकास अधिकारी स्वाति भदौरिया इससे इंकार करती है पर, साथ ही जांच की बात भी कहती हैं।

अधर में लटकी है सीवरेज जल से सिंचाई की योजना

गंगा को गंदे पानी से बचाने के लिए एसटीपी में शोधित होने वाले जल को उसमें छोड़ने की बजाए उसे सिंचाई के काम में लेने की योजना बनाई गई थी। पर, यह योजना भी पिछले तीन वर्षों से अधर में ही लटकी हुई है। पहले किसानों से जमीन अधिग्रहण के चक्कर में, फिर सिं सिंचाई के लिए पानी ले जाने को नहर बनाने के लिए। फिवक्त न तो नहर बन पाई और न ट्रीटेड सीवरेज से जल से सिंचाई ही शुरू हो पाई।

ये नाले गंगा में बहाते हैं रोजाना 50 एमएलडी गंदगी

गंगा का ऊपर भाग (अपर स्ट्रीम)--लोकनाथ नाला, सप्तसरोवर नाला, भीमगोडणा नाला, करोली नाला, रेलवे नाला, कर्णवाल नाला, कांगड़ा मंदिर नाला, नाई सोता नाला, नागो की हवेली नाला, कुशाघाट नाला, ललतारौ नाला,

गंगा का निचला भाग (डाउन स्ट्रीम) –-मायापुर नाला, देवपुरा नाला, भल्ला कॉलेज टंकी-06 नाला, पीडब्ल्यूडी नाला, खन्ना नगर नाला, आवास विकास नाला, , शिवमंदिर-लाल मंदिर नाला, कसाई नाला, पांडेवाला नाला, रामरक्खा नाला, लाटोवाली नाला, जगजीतपुर नाला, मात्रसदन नाला

366 औद्योगिक इकाई डाल रहीं औद्योगिक कचरा व पानी

हरिद्वार में 366 औद्योगिक इकाइयां अपना औद्योगिक और केमिकल युक्त पानी सीधे गंगा में डाल रही हैं। ये सभी औद्योगिक इकाइयां वर्षों से ऐसा कर रही थीं। इसका खुलासा प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप और निर्देशन पिछले दिनों केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के संयुक्त निरीक्षण में हुआ। संयुक्त टीम ने जिले की 964 औद्योगिक इकाइयों का निरीक्षण किया था, जिसमें 366 को प्रदूषण मानकों का उल्लंधन करने और गंगा को गंदा करने का दोषी पाया था। सीपीसीबी ने इसके बाद सभी 366 इकाइयों को तत्काल प्रभाव से बंद करने के आदेश एसपीसीबी को दिए हैं। कार्रवाई होना अभी बाकी है।

दीपक रावत, (जिलाधिकारी हरिद्वार) का कहना है कि हरिद्वार में गंगा की सफाई और उसे प्रदूषण रहित बनाने के लिए जिला प्रशासन पूरी तरह से गंभीर हैं, गंगा में गंदगी फैला रही औद्योगिक इकाइयों के खिलाफ जल्द सख्त कार्रवाई की जाएगी। यही दुभाग्यपूर्ण है कि तमाम प्रयासों के बावजूद गंगा की सफाई के इंतजाम पूरे नहीं हो पाए, इस दिशा में गंभीरता से काम किया जा रहा है। जल्द ही व्यवस्था में सुधार हो जाएगा।

अजय कुमार, (अधिशासी अभियंता, जलसंस्थान) का कहना है कि शहरी क्षेत्र की तीनों एसटीपी को रोजाना के स्तर पर तकरीबन 100 एमएलडी सीवरेज और ड्रैनेज जल मिल रहा है, एसटीपी की कुल क्षमता का उपयोग करने के बाद इनमें से 63 एमएलडी जल को शोधित करने के बाद और बाकी को इसके बगैर ही यहां से छोड़ दिया जाता है।

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Ghanshyam Chandra

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