कूर्मांचल सांस्कृतिक एवं कल्याण परिषद, गढ़ी शाखा द्वारा आयोजित किया गया “भिटौली” कार्यक्रम

भिटौली : मायके की ममता और रिश्तों का अटूट बंधन
भावनाओं में बसा मायके का आँगन : भिटौली
आकाश ज्ञान वाटिका, रविवार, 29 मार्च 2026, देहरादून। उत्तराखंड की पावन धरती सदियों से अपनी समृद्ध लोकसंस्कृति, गहरी मानवीय संवेदनाओं और आत्मीय रिश्तों की परंपराओं के लिए जानी जाती रही है। यहाँ का प्रत्येक पर्व केवल उत्सव नहीं होता, बल्कि वह जीवन के उन कोमल और अनमोल पहलुओं को स्पर्श करता है, जो मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़े रखते हैं। इन्हीं भावनात्मक परंपराओं में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और हृदयस्पर्शी पर्व है: ‘‘भिटौली’’, जो विशेष रूप से देवभूमि उत्तराखण्ड के कुमाऊँ अंचल में मनाया जाता है और आज भी उतनी ही श्रद्धा, प्रेम और अपनत्व के साथ जीवित है, जितना सदियों पहले था।

रविवार, 29 मार्च 2026 को कूर्मांचल सांस्कृतिक एवं कल्याण परिषद, गढ़ी शाखा द्वारा आयोजित भिटौली कार्यक्रम ने इस परंपरा को एक बार फिर जीवंत कर दिया। यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि भावनाओं का एक विशाल मंच था, जहाँ हर व्यक्ति अपने भीतर छिपी स्मृतियों, रिश्तों और संवेदनाओं से जुड़ता हुआ नजर आया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि आदित्य चैहान प्रदेश मंत्री भाजपा, अति विशिष्ट अतिथि श्रीमती सुमित्रा ध्यानी पूर्व पार्षद एवं समाज सेविका, कार्यक्रम अध्यक्ष श्रीमती देवकी नौटियाल पार्षद कौलागढ़, विशिष्ट अतिथि राजेंद्र सिंह बिष्ट अध्यक्ष कुमाऊँ समिति, डाॅ. लक्ष्मण सिंह बिष्ट अध्यक्ष उत्तराखंड सत रुद्राक्ष ट्रस्ट, श्रीमती समिधा गुरुंग पूर्व पार्षद, केंद्रीय अध्यक्ष कूर्मांचल परिषद कमल रजवार, महासचिव गोविंद पांडे एवं अन्य अतिभियों द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया।
कुमाऊँ की प्रसिद्ध परंपरा “शकुन आखर” के माध्यम से गणेश जी का आह्वान किया गया। “शकुना दे………..” की मधुर ध्वनि जैसे ही वातावरण में गूँजी, वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति मानो अपनी संस्कृति की जड़ों में उतर गया। यह केवल एक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि अपनी पहचान, अपनी विरासत और अपनी आस्था से जुड़ने का एक सशक्त माध्यम था, जिसे कूर्मांचल परिषद, गढ़ी शाखा की सचिव एवं लोकसंस्कृति की संरक्षक श्रीमती बबिता शाह लोहनी के कुशल नेतृत्व में उनकी टीम द्वारा यह भव्य रूप दिया गया।
श्रीमती बबिता शाह लोहनी ने बताया कि भिटौली पर्व का आरंभ चैत्र मास के प्रथम दिवस, फूलदेई से होता है। यह वही समय होता है जब प्रकृति स्वयं नवजीवन का संदेश देती है। पेड़ों पर नई कोपलें फूटती हैं, खेतों में हरियाली लहराती है और वातावरण में एक नई ऊर्जा का संचार होता है। इसी नवजीवन के साथ यह पर्व भी रिश्तों में नई ताजगी और आत्मीयता लेकर आता है। इस पूरे माह में विवाहित बेटियों को विशेष रूप से याद किया जाता है। उन्हें मायके बुलाया जाता है या उनके ससुराल जाकर उन्हें भिटौली के रूप में कपड़े, मिठाइयाँ, पैसे और घर के बने पारंपरिक पकवान उपहार स्वरूप दिए जाते हैं। यह सब केवल वस्तयें नहीं होतीं, बल्कि यह मायके की ममता, प्रेम और आशीर्वाद का प्रतीक होता है।
पुराने समय में जब न तो मोबाइल थे और न ही संचार के अन्य सशक्त साधन, तब भिटौली का महत्व और भी अधिक गहरा हुआ करता था। दूर-दराज के पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाली बेटियाँ अपने मायके की खबर पाने के लिए इस पर्व का इंतजार करती थीं। भाई जब भिटौली लेकर अपनी बहन के घर पहुँचता था, तो वह केवल उपहार लेकर नहीं जाता था, बल्कि वह अपने साथ माँ की ममता, पिता की चिंता और पूरे परिवार का स्नेह लेकर जाता था। यह एक ऐसा अवसर होता था जब बहन अपने मन की बात कह पाती थी, अपने सुख-दुःख साझा कर पाती थी और मायका उसके जीवन का सहारा बनकर उसके साथ खड़ा रहता था।

आज भले ही समय बदल गया हो, तकनीक ने दूरियों को कम कर दिया हो, लेकिन भिटौली का महत्व आज भी उतना ही जीवंत और आवश्यक है। आधुनिक जीवन की व्यस्तता में जब रिश्तों के लिए समय निकालना कठिन होता जा रहा है, तब यह पर्व हमें ठहरकर अपने प्रियजनों के बारे में सोचने, उन्हें महसूस करने और उनके प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करने का अवसर देता है। यह हमें यह भी सिखाता है कि चाहे जीवन कितना भी व्यस्त क्यों न हो जाए, रिश्तों की गर्माहट और आत्मीयता को बनाए रखना सबसे आवश्यक है।
गढ़ी शाखा द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने पूरे वातावरण को भावनाओं और उत्साह से भर दिया। वाटिका नृत्य कला अकादमी के बच्चों द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना ने ज्ञान और कला के प्रति श्रद्धा को अत्यंत सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किया। कथक नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया और यह दर्शाया कि हमारी पारंपरिक कलायें आज भी प्रासंगिक और प्रभावशाली हैं।
श्रीमती कमला उप्रेती और रमा कांडपाल द्वारा प्रस्तुत भिटौली पर आधारित लघु नाटिका कार्यक्रम का एक अत्यंत भावुक और प्रभावशाली हिस्सा रही। इस नाटिका में एक विवाहित बेटी की भावनाओं, उसके मायके के प्रति प्रेम और उसके भीतर छिपी उस कोमल लालसा को इतने सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया कि वहाँ उपस्थित महिलायें भावुक हो उठीं। कई आँखों में आँसू थे, लेकिन उन आँसुओं में दर्द नहीं, बल्कि अपनत्व, स्मृति और प्रेम की गहराई झलक रही थी।
कुमाऊँनी लोकनृत्य और गीतों ने कार्यक्रम में नई ऊर्जा भर दी। संगीता बिष्ट, मीना सयाला और स्वाति भट्ट द्वारा प्रस्तुत एकल नृत्य ने दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित किया। नथनपुर शाखा की अध्यक्ष श्रीमती शर्मिष्ठा कफलिया द्वारा प्रस्तुत कुमाऊँनी गीत ने वातावरण को मधुरता से भर दिया। कांवली शाखा से मंजू देवपा और उनकी टीम द्वारा प्रस्तुत भिटौली गीत और झोड़ा नृत्य ने पूरे कार्यक्रम को एक जीवंत लोक उत्सव का रूप दे दिया।
“हमारी पहचान” रंगमंच के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत रंगारंग कार्यक्रमों ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया और यह दिखाया कि संस्कृति केवल परंपरा नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम भी है। कार्यक्रम में भगवती नेगी द्वारा महिलाओं के स्वास्थ्य पर दिया गया वक्तव्य भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। यह इस बात का संकेत था कि परंपरा और आधुनिकता का संतुलन ही समाज को आगे बढ़ाता है।

इस आयोजन की एक विशेष और अत्यंत भावनात्मक झलक तब देखने को मिली जब सभी महिलायें अपने-अपने घरों से विभिन्न प्रकार के पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन बनाकर लाई। बड़े, पुए, पूरी, खीर, चने, आलू के गुटके, भांग की चटनी, सिंगल, खजूर, रायता और हलवा, इन सब व्यंजनों में केवल स्वाद ही नहीं था, बल्कि उनमें प्रेम, परिश्रम और परंपरा की सुगंध भी समाई हुई थी। जब इन व्यंजनों को सबके साथ साझा किया गया, तो वह केवल भोजन का आदान-प्रदान नहीं था, बल्कि भावनाओं का उत्सव था।

कार्यक्रम का सबसे मार्मिक क्षण तब आया जब नेहरू कॉलोनी, धरमपुर से आयी श्रीमती निर्मला जोशी को भिटौली का उपहार दिया गया। वह भावुक हो उठीं और उन्होंने कहा, “गढ़ी शाखा अब मेरा मायका है, मैं हमेशा यहाँ आऊँगी।” यह वाक्य सुनते ही पूरा वातावरण भावनाओं से भर गया। यह केवल एक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि इस बात का प्रमाण था कि भिटौली केवल रक्त संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज को एक बड़े परिवार में बदलने की क्षमता रखता है।
भिटौली का सांस्कृतिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक ऐसा माध्यम है जो पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करता है, सामाजिक समरसता को बढ़ाता है और हमारी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखता है। यह हमें सिखाता है कि रिश्ते केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जीवन का सबसे सुंदर उपहार हैं।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि द्वारा सभी महिलाओं को भिटौली के रूप में उपहार प्रदान किए गए, जो इस परंपरा को सम्मान देने का एक सुंदर प्रयास था। साथ ही, समाज में योगदान देने वाले व्यक्तियों को सम्मानित किया गया, जिससे यह संदेश गया कि समाज में हर व्यक्ति का योगदान महत्वपूर्ण है और उसे पहचान मिलनी चाहिए।
इस पूरे आयोजन में गढ़ी शाखा की कार्यकारिणी और सभी सदस्यों की सक्रिय भागीदारी ने इसे सफल बनाया। यह आयोजन इस बात का उदाहरण है कि यदि समाज एकजुट होकर अपनी परंपराओं को सहेजने का प्रयास करे, तो वे न केवल जीवित रह सकती हैं, बल्कि और भी अधिक प्रभावशाली बन सकती हैं।
भिटौली हमें यह सिखाती है कि रिश्तों की डोर को मजबूत बनाए रखने के लिए केवल शब्द नहीं, बल्कि भावनाओं की आवश्यकता होती है। यह पर्व हर बेटी को यह विश्वास दिलाता है कि वह कभी अकेली नहीं है, उसका मायका हमेशा उसके साथ है। और हर परिवार को यह प्रेरणा देता है कि वे अपने रिश्तों को सहेजें, उन्हें समय दें और उन्हें प्रेम से सींचते रहें।
आज के समय में जब समाज तेजी से बदल रहा है, तब ऐसे पर्व हमें अपनी पहचान बनाए रखने का अवसर देते हैं। यह हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं और यह याद दिलाते हैं कि हम चाहे जहाँ भी जाएँ, हमारी संस्कृति और हमारे रिश्ते हमेशा हमारे साथ रहते हैं।
भिटौली की यह परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य की दिशा है। यह हमें एक बेहतर समाज बनाने की प्रेरणा देती है, एक ऐसा समाज जहाँ प्रेम हो, सम्मान हो, अपनत्व हो और हर व्यक्ति को अपनेपन का अहसास हो।
यह परंपरा यूँ ही पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रहे, रिश्तों में प्रेम और विश्वास की यह डोर और मजबूत होती रहे, और हर बेटी को यह एहसास मिलता रहे कि उसका मायका हमेशा उसके साथ है—यही इस पावन पर्व का सबसे सुंदर, सबसे सच्चा और सबसे प्रेरणादायक संदेश है।
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