‘अनघ (निष्पाप)–मेरी अपनी यात्रा’ : स्मृतियों की पगडंडी से जीवन के उजास तक

जब स्मृतियाँ शब्दों का रूप लेती हैं तो वे आने वाली पीढ़ियों की धरोहर बन जाती हैं।
‘अनघ’ केवल श्याम सुन्दर कांडपाल की जीवन-यात्रा नहीं है; यह एक पीढ़ी की स्मृतियों, संस्कारों और सामाजिक सरोकारों का दस्तावेज भी है : घनश्याम चन्द्र जोशी

आकाश ज्ञान वाटिका, शनिवार, 5 सितम्बर 2026, देहरादून। कुछ पुस्तकें केवल पढ़ी नहीं जातीं, वे भीतर उतरती हैं। कुछ पन्ने केवल शब्द नहीं होते, बल्कि बीते हुए समय की धड़कन, रिश्तों की गर्माहट, मिट्टी की सुगंध और जीवन के अनुभवों का सजीव संसार अपने भीतर समेटे होते हैं। आनरेरी कैप्टेन श्याम सुन्दर कांडपाल की वर्ष 2026 में प्रकाशित पुस्तक ‘अनघ (निष्पाप)–मेरी अपनी यात्रा’ ऐसी ही एक आत्मीय कृति है, जो पाठक को लेखक के जीवन की यात्रा के साथ-साथ उसकी अपनी स्मृतियों की गलियों में भी ले जाती है।
भारतीय नौसेना में चार दशक तक राष्ट्रसेवा करने वाले श्याम सुन्दर कांडपाल का जीवन अनुशासन, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा का उदाहरण रहा है। सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्होंने समाजसेवा और लेखन को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाया। मूल रूप से कांटली, कौसानी की धरती से जुड़े आनरेरी कैप्टेन श्याम कांडपाल के मन में अपनी जन्मभूमि, उसकी संस्कृति, कला, लोकजीवन और जीवन-पद्धति के प्रति गहरा अनुराग है। यही अनुराग उनकी लेखनी में बार-बार दिखाई देता है।
‘अनघ’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें लेखक ने अपने जीवन की 29 कहानियों को केवल घटनाओं के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उन्हें संवेदनाओं और स्मृतियों की माला में पिरोया है। बचपन की छोटी-छोटी घटनाएं, गांव की मिट्टी, रिश्तों का अपनापन, जीवन के संघर्ष, मानवीय संवेदनाएं और समाज के बदलते स्वरूप की झलक, इन सबका सुंदर समन्वय इस पुस्तक को आत्मकथात्मक संस्मरणों से कहीं आगे ले जाता है।
आनरेरी कैप्टेन श्याम सुन्दर कांडपाल के व्यक्तित्व का एक अत्यंत भावुक पक्ष तब सामने आता है, जब वे भारतीय नौसेना से सेवानिवृत्त होकर अपने बचपन के विद्यालय पहुंचे और वहां के बच्चों से मिले तथा उन्हें उपहार भेंट किए। यह दृश्य केवल एक पूर्व सैनिक का अपने विद्यालय लौटना नहीं था, बल्कि अपनी जड़ों, अपनी जन्मभूमि और अपने बचपन को प्रणाम करने जैसा था। शायद यही भाव ‘अनघ’ के प्रत्येक पृष्ठ में दिखाई देता है, “अतीत को विस्मृत किए बिना वर्तमान को समझना और आने वाली पीढ़ी के लिए अनुभवों की मशाल सौंपना।”
उनकी सामाजिक सक्रियता और रिश्तों को निभाने की सहज कला भी पुस्तक की आत्मा में दिखाई देती है। आनरेरी कैप्टेन श्याम कांडपाल ने जीवन को केवल उपलब्धियों से नहीं, बल्कि रिश्तों, संवेदनाओं और मानवीय मूल्यों से मापा है। उनकी कहानियाँ पाठक को यह एहसास कराती हैं कि जीवन की वास्तविक समृद्धि बड़े पदों और भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे क्षणों में छिपी होती है जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।

‘अनघ’ का शीर्षक भी अपने आप में अर्थपूर्ण है, “निष्पाप, निर्मल और सहज।” पुस्तक में संकलित संस्मरणों की सहजता और आत्मीयता इसी भाव को पुष्ट करती है। लेखक ने अपने जीवन को किसी नायक की गाथा बनाने के बजाय एक सामान्य मनुष्य की असाधारण संवेदनाओं के रूप में प्रस्तुत किया है। यही इसकी सबसे बड़ी साहित्यिक शक्ति है।
मेरी दृष्टि में ‘अनघ’ केवल श्याम सुन्दर कांडपाल की जीवन-यात्रा नहीं है; यह एक पीढ़ी की स्मृतियों, संस्कारों और सामाजिक सरोकारों का दस्तावेज भी है। यह पुस्तक आज की पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने, रिश्तों की गरिमा समझने, समाज के प्रति उत्तरदायी बनने और अपने अतीत को सम्मान देने की प्रेरणा देती है।
जब स्मृतियाँ शब्दों का रूप लेती हैं तो वे आने वाली पीढ़ियों की धरोहर बन जाती हैं। ‘अनघ’ भी ऐसी ही धरोहर है। इसमें पहाड़ की मिट्टी की खुशबू है, बचपन की निश्छलता है, सैनिक जीवन का अनुशासन है, रिश्तों की मिठास है और समाज के लिए कुछ कर गुजरने की अदम्य इच्छा है।
“अनघ (निष्पाप)–मेरी अपनी यात्रा” पढ़ते हुए मुझे लगा कि यह केवल लेखक की अपनी यात्रा नहीं, बल्कि हम सबकी उन भूली-बिसरी यात्राओं का आईना है, जिनमें हमारा बचपन, हमारी मिट्टी और हमारे अपने लोग आज भी जीवित हैं।
मैं आनरेरी कैप्टेन श्याम सुन्दर कांडपाल को इस आत्मीय और प्रेरणादायी कृति के लिए हृदय से बधाई देता हूँ और कामना करता हूँ कि उनकी लेखनी इसी तरह देवभूमि की संस्कृति, लोकजीवन और मानवीय संवेदनाओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाती रहे।
— घनश्याम चन्द्र जोशी
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