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सम्पादकीय

सम्पादकीय (आकाश ज्ञान वाटिका)

                   देश प्रगति-पथ पर सदैव अग्रसर रहे, प्रत्येक नागरिक की यही चाह होती है, लेकिन विकास का समय, काल व परिस्थिति के अनुसार होना भी अति आवश्यक है। देश का प्रत्येक नागरिक समृद्ध हो, हर कोई यही सोचता है। निश्चित तौर पर आज देश विकसित राष्ट्रों में अपना स्थान बना चुका है। समृद्धि की प्राप्ति भी विकास के साथ-साथ होना स्वाभाविक है। धन-दौलत को पाना जितना कठिन है, उससे ज्यादा कठिनाई इसके सुनियोजित उपयोग करने के रास्ते में आती है। धन अर्जित करने में अवश्य परिश्रम करना पड़ता है, कठिन राहों से होकर गुजरना पड़ता है। इससे भी कठिन है अर्जित धन-सम्पदा का सुनियोजित उपयोग कर पाना क्योंकि यही धन-दौलत आदमी को उपलब्धियों के शिखर पर चढ़ा देती है तो दूसरी ओर उसके पतन का कारण भी कही न कही अत्यधिक धन-दौलत तथा उसका सुनियोजित व सुव्यवस्थित उपयोग न कर पाना है। मानव अपने कर्मों के आधार पर वर्गीकृत होता है; धन-सम्पत्ति, ऐशो-आराम भरी जीवन शैली आदि के आधार पर व्यक्तियों को पहचाना नहीं जाता। ‘सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय’ की भावना रखने वाला व्यक्ति कितना भी गरीब क्यों न हो, दिल से सम्पन्न होता है। अच्छे फैशन, व चमक-धमक से रहता व्यक्ति हमेशा तेजस्वी हो, यह आवश्यक नहीं है। हो सकता है बाहरी चमक-धमक के साथ-साथ उसका आन्तरिक मन, मस्तिष्क उतना ही खोखला हो। समाज में फैलती जा रही अराजकतायें ही सामाजिक पतन का कारण होती है।
आज नशे की बढ़ती समस्या नेे वास्तव में समाज को प्रदूषित कर दिया है। मानव आज भरपूर साधन-सम्पन्न है; सुख-सुविधाओं का अपार भंडार उसके पास है लेकिन इंसान की इंसानियत इस बात पर निर्भर करती है कि वह व्यक्ति विशेष इन सबका भोग किस तरह से करता है। आज अनुमान के आधार पर एक-तिहाई से ज्यादा लोग, जिसमें युवा-वर्ग सर्वाधिक हैं, सम्पन्नता व सुविधाओं का समुचित उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे लोगों को विलासितापूर्ण जीवन के अतिरिक्त और कुछ सोचने को नहीं है। जबकि यह सत्य है कि विलासितापूर्ण जीवन क्षणिक है। नशे की बढ़ती समस्या समाज के लिए एक तरह का धुन है जो अन्दर ही अन्दर समाज को खाये जा रहा है, उसे संस्कृति व संस्कारों से विहीन बना रहा है। नशा करना खुद के लिए जितना घातक है, उससे कई गुना ज्यादा घातक हमारे समाज के लिए है। यह एक संक्रामक समस्या है। इसीलिए आज धीरे-धीरे नशे की लत बढ़ती जा रही है। कुछ युवाओं का पथ-भ्रमित होना, इसी नशे की लत का परिणाम है। नशे की हालत में व्यक्ति स्वयं को तनाव मुक्त महसूस करता है, स्वतंत्र समझता है, लेकिन उसे यह मालूम नहीं कि यह क्षणित सुख व आनन्द पलभर में समाप्त हो जायेगा तथा उसे आगे के लिए तनावपूर्ण जीवन जीने को मजबूर कर देगा एवं उसकी स्वतंत्रता हमेशा गुलामी में परिवर्तित हो जायेगी।
पश्चिमी देश, जो अत्यधिक साधन-सम्पन्न हैं, वहाँ व्यक्तियों में नशे की लत अत्यधिक पायी जाती है। क्लबों में जाना, नशा करना, अश्लील नृत्य करना, वहाँ के पुरूषों के साथ-साथ कई महिलाओं ने भी अपनी जीवन-शैली का एक भाग बनाया है। भारत, अपनी अनुपम संस्कृति, कला, सभ्यता तथा मानवीय गुणों के लिए विश्व में जाना जाता है, जिसने बापू, सुभाष, भगत सिंह, पटेल जैसे देशभक्त पुरूष दिये, रानीलक्ष्मी बाई, सरोजिनी नायडू, इन्दिरा गांधी जैसी कई वीरांगनायें दी तो साथ ही साथ विवेकानन्द जैसे कई धर्मगुरू दिये। आज उसी भारत वर्ष के कई पुरूष, महिलायें व युवा अपनी वास्तविकता से दूर पाश्चात्य सभ्यता की राह में चल पडे हैं। सामाजिक हो, भौगोलिक हो या आर्थिक किसी भी दृष्टि से पाश्चात्य शैली हमारी जीवन-शैली से मेल नहीं खाती है, फिर भी समाज के एक बहुत बड़े हिस्से का इसकी गिरफ्त में आना, हमारे लिए बहुत बड़ा चिन्ता का विषय है।
‘‘भारत मॉ’’ के मुकुट, हिमालय की गोद में बसा उराखण्ड देवों की भूमि है। इस देवभूमि की जीवन-शैली अपने-आप में अनोखी है। सामाजिकता की दृष्टि से देखें तो हर तरफ भाईचारे का माहौल, देवभूमि की संस्कृति व कला की ही देन है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है; समाज में रहना, समाज से सीखना व समाज-हित में ही अपने आप को न्यौछावर करना, उसका अपना एक अलग अंदाज है। यही कारण है कि मानव सभ्य व सामाजिक प्राणी कहलाता है। देवभूमि की तो अपनी सभ्यता रही है, एक दूसरे के सुख-दुःख का साथी बनना। ‘‘बसुदैव कुटुम्बकुम’’ की भावना तो यहॉ के प्रत्येक व्यक्ति के दिल व दिमाग में बसी है। आज परिस्थितियाँ कुछ बदलती नजर आ रही हैं। पाश्चात्य संस्कृति ने हमारी संस्कृति व सभ्यता पर भी निगाहें टिकानी शुरू कर दी हैं। देवभूमि के अनेक लोग, पुरूष-स्त्री व युवा अपनी सभ्यता को त्याग, पाश्चात्य सभ्यता के क्षणिक सुख की चाह में राह भ्रमित हो, अनजाने लक्ष्य की ओर गतिमान हैं। नशे की बढ़ती समस्या हमारे समाज के लिए अभिशाप बनते जा रही है। क्लब, बार आदि जो हमारी संस्कृति के शब्द कभी नहीं हो सकते हैं, आज धडल्ले से अस्तित्व में आ रहे हैं। कुछ लोग धन अर्जित करने के उद्देश्य से अपने वसूलों का परित्याग कर चुके हैं तथा ऐसे-ऐसे नशे के अड्डे, क्लब, बार आदि चला रहे हैं, जिसमें युवक-युवतियाँ नर-नारी, विलासिता की क्षणित मस्ती में अपना जीवन ही नरक बनाने की दिशा में भटक रहे हैं। इसी बढ़ते नशे के कारण समाज में अराजकता का माहौल व्याप्त है; अपराधिक गति-विधियाँ बढ़ रही हैं, नतीजन समाज विघटित होता जा रहा है। पारिवारिक परम्परायें खत्म होती जा रही है। बुजुर्गों, महिलाओं की समाज में अनदेखी हो रही है।
आज वक्त की पुकार है कि ‘समाज को एकजुट करना है’, तभी समाज व राष्ट्र मजबूत व विकसित होगा। यह एक व्यक्ति विशेष का कार्य नहीं है। समाज के प्रत्येक प्रबुद्ध नागरिक का कर्तव्य बनता है कि वह समाज हित में आगे आये। नशे को इस देवभूमि से खत्म करना है तभी राष्ट्र का मस्तक ऊँचा होगा। जहॉ कहीं भी असमाजिक गतिविधियाँ नजर आये, सभी को एकजुटता का परिचय देकर, उनका डटकर विरोध करना चाहिए। समाज को फिर से वास्तविकता के पथ पर मोड़ने के प्रयास किये जाने चाहिए। वक्त की यही पुकार हैः
हम सब मिलकर आगे बढ़ते जायें,
पाश्चात्य सभ्यता को दूर भगायें।
अपराध मुक्त हो समाज हमारा,
नशा न अब कोई करने पायें ।
पहचानें हम संस्कृति स्वराष्ट्र की,
मिलकर हम सब आगे बढ़ते जायें।
— सम्पादक

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Ghanshyam Chandra

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