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सम्पादकीय

सम्पादकीय (धरा-पुकारती)

प्रकृति सब कुछ खामोश देख रही थी, सहन कर रही थी और समय-समय पर आगाह करती रहती थी, अब बहुत हो चुका, अब तो बन्द करो ! कहा गया है, अति किसी भी चीज की शुभ नहीं होती है। प्रकृति के साथ मानव ने जिस प्रकार अनैतिक व्यवहार किया, कहीं न कहीं हम उसी का परिणाम भुगत रहे हैं। उत्तराखण्ड में आई इस आपदा में जो हृदयविदारक घटनायें घटित हो गयी हैं, उनका जवाबदेह कौन है, यह प्रश्न हर एक व्यक्ति को अन्दर ही अन्दर झकझोर रहा है। हम खुद अपने अनियोजित व अवांछनीय कार्यों के कारण निरूत्तर से बन गये हैं। भारी संघर्ष के पश्चात जब हमें अलग प्रांत उत्तराखण्ड के रूप में मिला तो हर कोई आशावान दिख रहा था, प्रफुल्लित हो रहा था। हमने ख्वाब देखे थे कि अलग राज्य बनने के पश्चात हम पहाड़ को सजता-संवरता देखेंगे तथा जीवन हर ओर खुशहाल होगा, लेकिन राज्य प्राप्ति के इन तेरह वषों में हम आगे बढ़ने के बजाय, कई साल पीछे हो गये हैं। समूचे उत्तराखण्ड में जीवन संकट में पड़ चुका है। इस विनाशकारी जल-प्रलय ने प्रदेशवासियों की कमर ही तोड़कर रख दी है। पहाड़ में जिस भी ओर नजर डालते हैं वही बर्बादी का मंजर देखने को मिलता है। प्रदेश के सामने पुर्नर्निमाण का एक कठिन व बहुत बड़ा कार्य खड़ा है, जिसे सामाजिक व नैतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर पूरा करना अति आवश्यक है। हमें विकास के नाम पर अपनी मूलभूत मान्यताओं को दरकिनार नहीं करना चाहिये। झूठे विकास के जोश में हम अपनी आध्यात्मिक मान्यताओं को भूलते जा रहे हैं, जबकि यहीं वह मान्यताऐं हैं जिसके बूते पर्यावरण को संतुलित बनाये रखा जा सकता है। केदारघाटी समेत समूचे उत्तराखण्ड में आयी इस विनाशलीला का कारण हम चाहे जो भी सोचें लेकिन यह बात किसी से छुपी नहीं है कि इस त्रासदी का मुख्य कारण है; मानवीय भूल व गैर जिम्मेदाराना रवैया। एक आम नागरिक से लेकर सत्ता के गलियारों तक आज जिस कदर हमारी जीवन-शैली बदली है, उससे हर कोई समझ सकता है कि यह प्राकृतिक आपदा केवल प्रकृति-प्रदत्त नहीं है कहीं न कहीं यह मानव द्वारा किये गये कार्यों का प्रतिफल है। कहा जाता है कि हमें कोई ऐसे काम नहीं करने चाहिये जो किसी की राह में रोड़ा बनें। लेकिन हमने तो आज प्रकृति को भी नहीं छोड़ा। जीवनदायिनी, जलसंवाहक नदियों का तो हमने मार्ग ही रोकना चाहा । मंदमंद बहती व कलकल करती सुन्दर, शोभित व सौभाग्य सूचक नदियों के मार्ग को रोककर हमने जो गलती की, कहीं न कहीं उसी का खामियाजा हम आज भुगत रहे हैं। अभी भी हमें याद रखना होगा कि हमारी पौराणिक व आध्यात्मिक मान्यताऐं सर्वोपरि हैं। पर्यावरण संरक्षण व संवर्धन में भी इन मान्यताओं का बड़ा योगदान हमेशा रहा है। अभी भी वक्त है हमें अपनी वास्तविकता को पहचानना होगा तथा आघ्यात्मिक मान्यताओं के अनुरूप ही समस्त विकास के काम करने होगें।
—सम्पादक

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Ghanshyam Chandra

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