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नैतिकता के अभाव में मानव दानव की राह

        नैतिक शिक्षा ही मानव को ‘मानव’ बनाती है क्योंकि नैतिक गुणों के बल पर ही मनुष्य वंदनीय बनता है। सारी दुनिया में नैतिकता अर्थात सच्चरित्रता के बल पर ही धन-दौलत, सुख और वैभव की नींव खड़ी है। प्रसंग बताता है कि ‘इन्द्र ने ब्राह्मण का रूप धारण करके प्रह्लाद के पास जाकर पूछा- ‘‘आपको तीन लोकों का राज्य कैसे मिला ?’’ प्रह्लाद ने इसका कारण नैतिकता (शील)को बताया। इन्द्र ने प्रह्लाद से वरदान में नैतिकता अर्थात् शील को मांग लिया। शील के जाते ही धर्म, सत्य, सदाचार, बल, लक्ष्मी सभी चले गये।’’

        भारत की नैतिकता इतनी ऊँची थी कि सारा संसार अपने चरित्र के अनुसार शिक्षा प्राप्त करे।ऐसी घोषणा यहाँ की जाती थी। नैतिकता के अंग हैं – सच बोलना, चोरी न करना, अहिंसा, दूसरों के प्रति उदारता, शिष्टता, विनम्रता, सुशीलता आदि। परन्तु आज ये शिक्षा ना तो बालक के माता-पिता, जिन्हें बालक की प्रथम पाठशाला कहा जाता है, ना ही विद्यालय दे पा रहा है। नैतिक शिक्षा के अभाव के कारण ही आज जगत में अनुशासनहीनता का बोल-बाला है। आज का छात्र कहाँ जानता है, बड़ों का आदर-सत्कार, छोटों से शिष्ठता-प्यार, स्त्री जाति की सुरक्षा-सम्मान सत्कार। रही-सही कसर पूरी कर देता है हमारा फिल्मजगत और टेलिविजन प्रसारण। जो अश्लीलता की हर हदें पार कर चुका है और उसका मूल्य चुकाना पड़ता है समाज को, क्योंकि मनुष्य का स्वभाव है अनुकरण करना। वह अनुकरण से ही सीखता है। आज नायिकाओं में नग्नता परोसने की होड़ लगी है कि कौन कितने कपड़े उतारता है तथा कौन कितना बोल्ड सीन दे सकता है? पैसे की चकाचौंध ने इतना अंधा बना दिया कि वह यह भूल गई हैं कि इसका दुष्परिणाम भुगत रही हैं हमारी नवयुवतियाँ, बच्चियाँ, स्त्रियाँ। यह कथन कितना चरितार्थ होता है – कि ‘स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है’। दर्शक टेलीविजन चैनलों पर, सिनेमा में पेश नग्नता, उनके नग्नता भरे दृश्यों से कितना विचलित हो रहा है, उसकी भड़ास का शिकार, उसके घरों के आस-पास में जहाँ कहीं मौका मिलता है, मासूम बच्चियाँ, महिलायें बन रही हैं। पिता के साथ बेटी सुरक्षित नहीं, भाई के साथ बहन, पति के साथ पत्नी भी असुरक्षित हैं। समाज में एक ज्वाला जली है हवस की। चारों तरफ, जहाँ पढ़ो, सुनो व देखने को मिलता है देश में महिलाओं के खिलाफ असामाजिक घटनायें तेजी से बढ़ रही हैं। दूसरी ओर यदि हम देखें तो साहित्य व सिनेमा जगत समाज का दर्पण होते हैं। जहाँ एक ओर वे गलत दिखाकर समाज को गलत राह पर ले जा रहे हैं, तो वहीं दुसरी ओर सही सोच, सही प्रदर्शन दिशा भ्रमित होने से बचा सकता है। इतिहास बताता है कि ‘राजा जयसिंह अपनी नव विवाहिता के प्रेम प्यार में आबद्ध होकर राजकाज भूल गये थे। बिहारी कवि की एक श्रृंगारिक अन्योक्ति ने राजा को सचेत कर कर कर्तव्य पथ पर अग्रसर कर दिया –

                                                नहिं परागु नहिं मधुर मधु नहिं विकास इहिकाल ।
                                                अलि कली ही सों बिंध्यौ, आगे कौन हवाल ।।

इस दोहे ने राजा जयसिंह की आँखें खोल दी थी। यहाँ पूरे ही समाज का दायित्व हो जाता है कि हम अपने नैतिक मूल्यों का पुर्नस्थापन करें। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि ‘‘ भारत ही वह देश है जो जीवन के नैतिक मूल्यों के साथ अब तक पर्वत से भी अधिक दृढ़ भाव से खड़ा है।’’ अफसोस! आज हम अपने पूर्वजों के दिखायें, बताये मार्ग को भूल गये हैं। पाश्चात्य सभ्यता, संस्कृति को अपनाते-अपनाते, ना तो हम खुद को ही पहचान पा रहे हैं, ना ही पाश्चात्य को। कुछ नवयुवतियाँ भी आजादी मिलने का अर्थ कुछ और ही ले रही हैं। माँ-बाप की खुली छूट का गलत फायदा उठा रही हैं। आये दिन अखबारों, पेपरों में छप रहा है कि शराब पीकर लड़कियों ने हंगामा किया। देर रात तक लड़कों के साथ क्लबों में, होटलों में पार्टी करना आज आम हो रहा है। ऐसा इसलिये हो रहा है कि हमारे नैतिक जीवन मूल्यों का पतन हो रहा है। नारी का ऐसा घृणित व्यवहार, घटिया मानसिकता और निकृष्ठ सोच का परिणाम है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि -‘‘किसी भी राष्ट्र की प्रगति का सर्वोत्तम थर्मामीटर वहाँ की महिलाओं की स्थिति है।’’ नारी राष्ट्रीय व सामाजिक जीवनामृत का केन्द्र है। जो राष्ट्र समाज में स्त्रियों का आदर नहीं करना चाहते व कभी महान बन ही नहीं पायेंगे। देश के वर्तमान पतन का मुख्य कारण यही है कि हमने शक्ति की इन सजीव प्रतिमाओं के प्रति आदरभाव नहीं रखा। स्त्रियों के प्रति घृणित दृष्टि निन्दनीय है। माँ के रूप में, बहन-बेटी के रूप में महिलाओं को सुरक्षा, सुविधा, स्नेह व दुलार देना समाज का कर्तव्य है। नैतिकता और सदाचार ही राष्ट्रीय जीवन का आधार है।

आज समाज में इन्हीं नैतिक मूल्यों की स्थापना की सबसे अधिक जरूरत है। प्रत्येक बच्चे को सही मार्ग दर्शन मिले, यह उचित शिक्षा ही कर सकती है। नैतिकता का पाठ पढ़ाया नहीं जा सकता, वरन् उसे चरित्र में उतारना है। गीता को कंठ से गाना ही नहीं होता वरन् उसका अक्स अपने हृदय में बसाना होगा तभी यह देश स्त्रियों, मासूम बच्चियों का आदर, सुरक्षा का दर्जा दे पायेगा। वरना मानव दानव का रूप धर चुका है तथा उसका रूकना कठिन ही नहीं नामुमकिन हो जायेगा।

डॉ. सुधा गुप्ता

63 ,  मोती बाजार
देहरादून

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Ghanshyam Chandra

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One Comment

  1. बहुत बढ़िया मार्गदर्शन समाज के लिए ऐसे ही विचारों को इस समाज में फ़ैलाने की जरुरत है । बहुत बहुत आभार आपका ।

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