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सामाजिक और पारिवारिक एकबद्धता का माध्यम : “रक्षाबन्धन”

  • रक्षाबंधन भाई बहिन के अटूट प्यार के रिश्ते का प्रसिद्ध त्यौहार है।

येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥

अर्थात, “जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ। हे रक्षे (राखी), तुम अडिग रहना, अपने संकल्प से कभी भी विचलित न हो।”

आकाश ज्ञान वाटिका, 22 अगस्त 2021, रविवार, देहरादून। रक्षाबंधन भाई बहिन के अटूट प्यार के रिश्ते का प्रसिद्ध त्यौहार है जो प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। श्रावण अर्थात सावन में मनाये जाने के कारण इसे श्रावणी अर्थात सावनी भी कहते हैं। रक्षाबन्धन में राखी या रक्षासूत्र का सबसे अधिक महत्त्व है। राखी कच्चे सूत जैसे सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे, तथा सोने या चाँदी जैसी मँहगी वस्तु तक की हो सकती है, परन्तु यह एक रक्षा कवच है।

“रक्षाबंधन”, रक्षा का मतलब सुरक्षा और बंधन का मतलब बाध्य है। रक्षाबंधन के दिन बहिनें अपने भाईयों की तरक्की के लिए भगवान से प्रार्थना करती है और भाई अपनी बहिन की रक्षा का संकल्प लेता है। राखी सामान्यतः बहनें भाई को ही बाँधती हैं, परन्तु ब्राह्मणों, गुरुओं और परिवार में छोटी लड़कियों द्वारा सम्मानित सम्बंधियों, जैसे पुत्री द्वारा पिता को भी बाँधी जाती है। कभी-कभी सार्वजनिक रूप से किसी नेता या प्रतिष्ठित व्यक्ति को भी राखी बाँधी जाती है।

यहाँ तक कि अब प्रकृति-संरक्षण हेतु वृक्षों को राखी बाँधने की परम्परा भी प्रारम्भ हो चुकी है।

सभी धार्मिक अनुष्ठानों में रक्षा-सूत्र बाँधते समय कर्मकाण्डी पण्डित या आचार्य संस्कृत में एक श्लोक का उच्चारण करते हैं, जिसमें रक्षाबन्धन का सम्बन्ध राजा बलि से स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। भविष्यपुराण के अनुसार इन्द्राणी द्वारा निर्मित रक्षा-सूत्र को देवगुरु बृहस्पति ने इन्द्र के हाथों बाँधते हुए निम्नलिखित स्वस्तिवाचन किया :

रक्षाबन्धन पर्व सामाजिक और पारिवारिक एकबद्धता या एकसूत्रता का सांस्कृतिक उपाय रहा है। विवाह के बाद बहिन पराये घर में चली जाती है। इस बहाने प्रतिवर्ष अपने सगे ही नहीं अपितु दूरदराज के रिश्तों के भाइयों तक को उनके घर जाकर राखी बाँधती है और इस प्रकार अपने रिश्तों का नवीनीकरण करती रहती है। दो परिवारों का और कुलों का पारस्परिक मिलन होता है। समाज के विभिन्न वर्गों के बीच भी एकसूत्रता के रूप में इस पर्व का उपयोग किया जाता है। प्रकृति के प्रति स्नेह का पर्व भी अब यह बन चूका है।

रक्षा बंधन का शुभ मुहूर्त

इस वर्ष रक्षाबंधन का त्यौहार 22 अगस्त 2021 को मनाया जा रहा है। 
22 अगस्त 2021 को दोपहर 01 बजकर 42 मिनट से शाम 04 बजकर 18 मिनट तक राखी बांधना सबसे शुभ रहेगा। हिंदू कैंलेडर के अनुसार 22 अगस्त 2021, रविवार को प्रात: 06 बजकर 15 मिनट से प्रात: 10 बजकर 34 मिनट तक शोभन योग रहेगा।

इस दिन धनिष्ठा नक्षत्र शाम को करीब 07 बजकर 39 मिनट तक बना रहेगा। रक्षाबंधन के पर्व पर शुभ संयोग बना रहेगा। हिंदू पंचांग के अनुसार दो विशेष शुभ मुहूर्त का योग इस वर्ष रक्षा बंधन पर बना हुआ है।

श्रावण पूर्णिमा की तिथि पर धनिष्ठा नक्षत्र के साथ शोभन योग का निर्माण हो रहा है। पूर्णिमा तिथि के समापन के साथ ही सावन का महीना भी समाप्त हो जाएगा। 23 अगस्त 2021 से भाद्रपद मास का आरंभ होगा।

रक्षाबंधन पर ‘भ्रदा’ का समय
रक्षाबंधन के पर्व पर इस दिन भद्रा का साया नहीं है। पंचांग के अनुसार भद्रा काल 23 अगस्त 2021 सोमवार को प्रात: 05:34 बजे से प्रात: 06:12 बजे तक रहेगी।

बहिनें अपने भाइयों को राखी बांधने के लिए थाली में कुमकुम, हल्दी, अक्षत, राखी के साथ कलश में पानी और आरती के लिए ज्योति रखें. इसके साथ ही भाई की पसंदीदा मिठाई को भी थाली में रखें।

पौराणिक मान्यता

राजपूत जब लड़ाई पर जाते थे तब महिलाएँ उनको माथे पर कुमकुम तिलक लगाने के साथ साथ हाथ में रेशमी धागा भी बाँधती थी। इस विश्वास के साथ कि यह धागा उन्हें विजयश्री के साथ वापस ले आयेगा। राखी के साथ एक प्रसिद्ध कहानी जुड़ी हुई है। कहा जाता है की “मेवाड़ की रानी कर्मावती को बहादुरशाह द्वारा मेवाड़ पर हमला करने की पूर्व सूचना मिली।

रानी लड़ऩे में असमर्थ थी अत: उसने मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेज कर रक्षा की याचना की। हुमायूँ ने मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज रखी और मेवाड़ पहुँच कर बहादुरशाह के विरूद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए कर्मावती व उसके राज्य की रक्षा की। एक अन्य प्रसंगानुसार सिकन्दर की पत्नी ने अपने पति के हिन्दू शत्रु पुरूवास को राखी बाँधकर अपना मुँहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकन्दर को न मारने का वचन लिया। पुरूवास ने युद्ध के दौरान हाथ में बँधी राखी और अपनी बहन को दिये हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकन्दर को जीवन-दान दिया।”

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रक्षाबंधन पर स्कन्ध पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में प्रसंग मिलता है। यह कहा गया है कि: “दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब भगवान वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा माँगने पहुँचे।

गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी। भगवान ने तीन पग में सारा आकाश पाताल और धरती नापकर, राजा बलि को रसातल में भेज दिया।

इस प्रकार भगवान विष्णु द्वारा बलि राजा के अभिमान को चकनाचूर कर देने के कारण यह त्योहार बलेव नाम से भी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि एक बार बाली रसातल में चला गया, तब बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया। तब से नारायण भी पाताल लोक में रहने लगे। ऐसे होते-होते काफी समय बीत गया।

उधर बैकुंठ में लक्ष्मीजी को भी नारायण की चिंता होने लगी। तब लक्ष्मीजी ने नारद जी से पूछा, आप तो तीनों लोकों में घूमा करते हैं। क्या नारायण को कहीं देखा है। तब नारद जी बोले कि आजकल नारायण पाताल लोक में हैं, राजा बलि की पहरेदारी कर रहे हैं। तब लक्ष्मीजी ने नारदजी से मुक्ति का उपाय पूछा और तभी नारद ने राजा बलि को भाई बनाकर रक्षा का वचन लेने का मार्ग बताया।

नारदजी की सलाह मानकर लक्ष्मीजी बलि के पास गई और बलि को भाई मानकर रक्षाबंधन करने का आग्रह किया। रक्षासूत्र बाँधने के बाद राजा बलि ने कहा आज से तुम आज से मेरी धरम की बहिन हो और मैं सदैव तुम्हारा भाई बनकर रहूँगा। तब लक्ष्मीजी ने कहा मुझे आपका ये पहरेदार चाहिये।

तब राजा बलि बोले, जब आपके पति तो वामन रूप धारण कर आये तो सब कुछ ले गये और जब आप बहिन बनकर आयीं और उन्हें भी ले गयीं। तबसे ही भाई बहिन के प्यार के इस अटूट बंधन को रक्षाबंधन त्यौहार के रूप मनाया जाने लगा। इसीलिए जब रक्षासूत्र बाँधा जाता है तो यह मंत्र पढ़ा जाता है:

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:, तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।

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Ghanshyam Chandra

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