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मनीष पंत, देवभूमि के एक ऐसे महान देशभक्त हैं जिनकी चित्रकला से भी भारत माँ की पावन माटी की खुशबू आती है

आकाश ज्ञान वाटिका, सोमवार, 13 जुलाई 2020, देहरादून। “अनेकता में एकता का प्रतीक” हमारे देश, भारत की संस्कृति अनुपम है। हमारी संस्कृति और पौराणिक धरोहरों पर हमें गर्व हैं। भारत की अनुपम संस्कृति, सभ्यता एवं कला की ओर आज पूरा विश्व आकर्षित हो रहा है। देवभूमि उत्तराखंड की संस्कृति, यहाँ की पौराणिक धरोहरों को निहारने एवं प्राकृतिक सौन्दर्य का आनन्द लेने के लिए देश ही नहीं विदेशों से भी पर्यटकों का यहाँ वर्षभर ताँता लगा रहता है। यहाँ के नौले-धारे, घराट, झरने, हरे-भरे, फल-फूलों से आच्छादित बागान आदि देवभूमि के प्राकृतिक सौन्दर्य को चार चाँद लगते हैं।
देवभूमि के लोगों की खूबसूरत एवं पवित्र जीवन-शैली भी अपने आप में अनोखी है। देवभूमि उत्तराखंड के साथ साथ, सम्पूर्ण भारत वर्ष की इस अनुपम संस्कृति एवं पौराणिक धरोहरों का संरक्षण एवं संबर्धन करना हम सबका परम कर्तव्य है। हमें अपने दैनिक जीवन के व्यक्तिगत  की क्रियाकलापों के साथ साथ कुछ समय अवश्य ही अपनी संस्कृति, कला को समझने एवं प्राचीन विरासतों के संरक्षण एवं इनके प्रचार प्रसार के लिए निकालना चाहिए।

[box type=”shadow” ]आज मैं देवभूमि के एक ऐसे महान देशभक्त का परिचय, उनकी कला के माध्यम से कराने जा रहा हूँ, जिनकी एक एक चित्रकला से भारत माँ की पवित्र माटी की खुशबू आती है। निश्चित तौर पर उनकी रचनाओं एवं कलाओं से हमें अपने पूर्वजों द्वारा प्रदत्त इस पवित्र संस्कृति एवं उनकी जीवन शैली को आत्मसात करने की प्रेरणा मिलती है।
उत्तराखंड देवभूमि के साथ ही जांबाज़ों की भूमि भी है। यहाँ के अधिकांश लोग भारत माँ की रक्षा के लिए सहर्ष सशस्त्र सेनाओं का हिस्सा बनते हैं।

ऋषिकेश निवासी श्री मनीष पंत, भारतीय थल सेना (आर्मी) की सिगनल कोर में सेवारत है। श्री मनीष पंत जहाँ एक ओर सेना में रहकर देश की सुरक्षा में तत्पर हैं वही वह अपनी संस्कृति एवं कला का भी दिल से स्नेह एवं सम्मान करते हैं। देश के महापुरुषों के प्रति उनका सम्मान उनकी कलाओं से स्वतः ही दृष्टिगत होता है। श्री मनीष पंत ने जहाँ एक ओर देवभूमि उत्तराखंड के त्याहारों/रीति-रिवाजों, यहाँ पौराणिक धरोहरों को अपनी चित्रकारी के माध्यम से संरक्षण देते हुए लोगों को जागरूक करने का भी काम कर रहे हैं वही उन्होंने यहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य की महत्ता को अपनी पेंटिंग कला के माध्यम से दर्शाने का काम किया हैं। कई महापुरुषों के स्केच भी श्री मनीष पंत द्वारा बनाये गए हैं। यह सब एक सैनिक की देशभक्ति के साथ ही, अपनी अनुपम संस्कृति, कला, प्राकृतिक सौन्दर्य, सभ्यता एवं पावन तीज-त्योहारों के प्रति अटूट आस्था एवं प्रेम को दर्शाता है, जो हम सबके लिए प्रेरणाप्रद है। [/box]

[box type=”shadow” ]श्री मनीष पंत द्वारा उत्तराखंड में लोकपर्व हरेला को चित्रकला के माध्यम से दर्शाते हुए हरियाली का सन्देश देकर, पर्यावरण संरक्षण हेतु वृक्षारोपण करने का सन्देश दिया गया है।
देवभूमि उत्तराखंड की धरती पर ऋतुओं के अनुसार कई अनेक पर्व मनाए जाते हैं। हमारे लोक पर्व हमारी संस्कृति को उजागर करते हैं, वहीं पहाड़ की परंपराओं को भी कायम रखे हुए, इन्हीं खास पर्वों में शामिल ‘हरेला’ उत्तराखंड में लोकपर्व के रूप में मनाया जाता है। हरेला शब्द का तात्पर्य हरियाली से हैं।यह लोकपर्व वर्ष में तीन बार आता हैं। पहला चैत्र मास में, दूसरा श्रावण मास में, तीसरा व वर्ष का आखिरी पर्व हरेला आश्विन मास में मनाया जाता हैं।
चैत्र मास में प्रथम दिन बोया जाता है तथा नवमी को काटा जाता है। श्रावण मास में सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में बोया जाता है और दस दिन बाद श्रावण के प्रथम दिन काटा जाता है। आश्विन मास में नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरा के दिन काटा जाता है।
उत्तराखंड में श्रावण मास में आने वाले हरेले को अधिक महत्व दिया जाता है। सावन का महीना हमारे सनातन हिन्दू धर्म में पवित्र महीनों में से एक माना जाता है। क्योंकि यह महिना भगवान महादेव को समर्पित है इसीलिए यह त्यौहार भी भगवान महादेव के परिवार को समर्पित है। उत्तराखंड की भूमि को तो शिव भूमि (देवभूमि) ही कहा जाता है। क्योंकि भगवान महादेव जी का निवास स्थान यहीं देवभूमि कैलाश (हिमालय) में ही है। इसीलिए श्रावण मास के हरेले में भगवान महादेव परिवार की पूजा अर्चना की जाती है। भगवान महादेव, माता पार्वती और भगवान गणेश की मूर्तियां शुद्ध मिट्टी से बना कर उन्हें प्राकृतिक रंग से सजाया-संवारा जाता है। जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘डिकारे’ कहा जाता है। हरेले के दिन इन मूर्तियों की पूजा अर्चना हरेले से की जाती है। और इस पर्व को शिव पार्वती विवाह के रूप में भी मनाया जाता है।
सावन लगने से नौ दिन पहले पाँच या सात प्रकार के अनाज के बीज एक रिंगाल की छोटी टोकरी में मिट्टी डाल के बोए जाते हैं। इसे सूर्य की सीधी रोशनी से बचाया जाता है और प्रतिदिन सुबह पानी से सींचा जाता है। 9 वें दिन इनकी पाती की टहनी से गुड़ाई की जाती है और दसवें यानि हरेला के दिन इसे काटा जाता है साथ ही विधि विधान के अनुसार घर के बुजुर्ग सुबह पूजा-पाठ करके हरेले को देवताओं को अर्पित करते हैं। उसके बाद घर के सभी सदस्यों को हरेला लगाया जाता है।
हरेला घर में सुख, समृद्धि व शान्ति के लिए बोया और काटा जाता है। हरेला अच्छी फसल का सूचक है, हरेला इस कामना के साथ बोया जाता है कि इस साल फसलों को नुकसान न हो। यह भी मान्यता है कि जिसका हरेला जितना बड़ा होगा, उसे कृषि मे उतना ही फायदा होगा। वैसे तो हरेला घर-घर में बोया जाता है, लेकिन किसी-किसी गाँव में हरेला पर्व को सामूहिक रुप से स्थानीय ग्राम देवता मंदिर में भी मनाया जाता हैं जिस में गाँव के लोगों द्वारा मिलकर मंदिर में हरेला बोई जाती हैं। और सभी लोगों द्वारा इस पर्व को हर्षोल्लास से मनाया जाता हैं।
हरेला चढ़ाते समय हमारे बड़े-बुजुर्गो द्वारा कुमाऊंनी बोली में आशीर्वाद कुछ इस प्रकार दिया जाता है:
“जी रया ,जागि रया…..
यो दिन बार, भेटने रया,
दुबक जस जड़ है जो,
पात जस पौल है जो,
स्यालक जस त्राण है जो,
हिमालय में ह्यू छन तक,
गंगा में पाणी छन तक,
हरेला त्यार मानते रया,
जी रया जागी रया”……
लोकगीत का भावार्थ इस तरह से है, “तुम जीते रहो और जागरूक बने रहो, हरेले का यह दिन-बार आता-जाता रहे, वंश-परिवार दूब की तरह पनपता रहे, धरती जैसा विस्तार मिले आकाश की तरह उच्चता प्राप्त हो, सिंह जैसी ताकत और सियार जैसी बुद्धि मिले, हिमालय में हिम रहने और गंगा जमुना में पानी बहने तक इस संसार में तुम बने रहो।” 

                                                                                         साभार : श्री मनीष पंत[/box]

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