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आइए “टी.बी. मुक्त भारत” बनाने में अपना योगदान दें

आकाश ज्ञान वाटिका, शनिवार, 11 मार्च 2023, देहरादून।

तपेदिक या टी.बी. (Tuberclosis)

भारत की सामान्य बीमारियों में से एक है- क्षय रोग या तपेदिक(टी.बी.)। तपेदिक या टी.बी. (Tuberclosis) एक संक्रामक बीमारी है जो आमतौर पर फेफड़ों को संक्रमित करती है। फेफड़ों के बाद यह धीरे-धीरे, दिमाग, रीढ़ समेत शरीर के अन्य हिस्सों में भी फैल सकती है। टी.बी. के ज्यादातर मामले एंटीबायोटिक दवाओं से ठीक हो जाते हैं लेकिन इसमें बहुत समय लग जाता है। #TB free india campaign

जीवाणु से होने वाली बीमारी है, TB यानि ‘ट्यूबरक्लोसिस

सबसे पहले हमें बीमारी के बारे में जानना होगा। टी.बी. यानि ‘ट्यूबरक्लोसिस’, जिसे हिंदी में तपेदिक कहते हैं, जीवाणु से होने वाली यह बीमारी है। तपेदिक, माइक्रोबैक्टरियम ट्यूबरक्लोसिस ( #Mycobacterium tuberculosis ) नामक जीवाणु से होती है। भारत में यह जीवाणु हवा में हर जगह ही मौजूद होते हैं, लेकिन इससे सभी को टी.बी. बीमारी नहीं होती है। यह बीमारी तब होती है, जब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity), कमजोर हो जाती है।

‘माइक्रोबैक्टरियम ट्यूबरक्लोसिस’ जीवाणु आदमी की सॉंस की नली से फेफड़ों में प्रवेश करते हैं। यहाँ पर मैक्रोफेज़ नामक प्रतिरक्षा प्रणाली इनको अपने अंदर ले लेती है। अन्य जीवाणु की तरह टी.बी. के जीवाणु को वह मार नहीं पाती है, इसलिए बहुत सारी कोशिकायें एक गुच्छा बनाकर इस बीमारी को यहीं पर रोकती हैं। इस पूरी संरचना को ग्रेलूनोमा ( #Granuloma ) कहते हैं। जैसे ही इंसान की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है, यह जीवाणु फैलने लग जाते हैं।

तपेदिक या टी.बी. की बीमारी प्राइमरी या सेकेंडरी हो सकती है। प्राइमरी का मतलब है, जब पहली बार जीवाणु शरीर में प्रवेश करते हैं और सेकेंडरी टी.बी. उसे कहा जाता है, जब प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होने की वजह से अपनी निष्क्रिय चरण से सक्रिय/जागृत हो जाते हैं। प्राथमिक तपेदिक अक्सर मीडियास्टिनल एडेनोपैथी से जुड़े मध्य और निचले फेफड़े के क्षेत्र की अपारदर्शिता का कारण बनता है, जबकि माध्यमिक तपेदिक में आमतौर पर ऊपरी लोब शामिल होते हैं, जिसमें अपारदर्शिता, गुहा या रेशेदार निशान ऊतक होते हैं। शारीरिक परीक्षा शामिल अंगों पर निर्भर करती है।

यदि ‘माइक्रोबैक्टरियम ट्यूबरक्लोसिस’ जीवाणु सिर्फ फेफड़ों में रूक नहीं पाया तो आगे जाकर तपेदिक या टी.बी धीरे-धीरे लसिकाओं और खून के मार्ग से पूरे शरीर में फ़ैल सकता है। टी.बी. पहले गाय का बिना प्रोसेस किया दूध से भी होता था, परन्तु पॉश्चुराजेशन के आने के बाद आँतों की टी.बी. कम होने लगी है। टी.बी. बीमारी बाल और नाखून को छोड़कर शरीर के सभी अंगों में हो सकती है।

कोई भी इंसान जिसको बुखार या खाँसी या रात को पसीना आते हुए दो सप्ताह या उससे अधिक समय हो जाता है, साथ में कपडे ढीले लगने लगते हैं, तो उसे टी.बी. की जॉंच करा लेनी चाहिए। इन लक्षणों के अलावा टी.बी. जिस भी जगह हो वहाँ की जॉंच करा सकते हैं।

तपेदिक (ट्यूबरक्लोसिस) के लक्षण
➲ तीन सप्ताह से अधिक समय तक खांसी होना
➲ सांस फूलना
➲ सांस लेने में तकलीफ होना
➲ शाम के दौरान बुखार का बढ़ जाना
➲ सीने में तेज दर्द होना
➲ अचानक से वजन का घटना
➲ भूख में कमी आना
➲ बलगम के साथ खून आना

टी.बी. के कुछ विशेष लक्षण :

पेट दर्द और कब्ज : आँतों की टी.बी.
पैरिलाइसिस : स्पाइन टी.बी.
दिल में पैरिकारडाइटिस : जिससे हार्ट अटैक के अवसर बढ़ जाते हैं
एक लक्षण जो सभी प्रकार की टी.बी. में होता है, वह है : कपड़ों का ढीला होना।

टी.बी. बीमारी एक संक्रमित आदमी से हवा के द्वारा दुसरे आदमी में फैलती है। जैसे कि हम जानते हैं कि यह जीवाणु हवा में हर जगह मौजूद है तो इससे बचने के लिए मास्क आदि से ज्यादा फायदा नहीं है, फिर भी हाथों का सैनिटाइजेशन जरूरी है और कोरोना काल में इंसानों की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होने के कारण टी.बी. जागृत हो सकती है, इसलिए मास्क पहनना भी जरूरी है। साथ ही साथ टी.बी. से ग्रसित आदमी से दूरी बनाई रखनी चाहिए। अगर परिवार में किसी को टी.बी. हुई है तो उसको अलग कमरा दें और मास्क पहनकर उसकी देख-रेख करें। साथ ही साथ प्रतिरक्षा प्रणाली को स्वस्थ रखने के लिए एक संतुलित आहार का सेवन करना चाहिए और अपनी साफ़-सफाई का विशेष ध्यान देने की आवस्यकता होती है। #डायरेक्टली ऑब्जर्व्ड थेरेपी शॉर्टकोर्स (DOTS)

राष्ट्रीय टीबी नियंत्रण कार्यक्रम

टी.बी. एक जीवाणु जनित बीमारी है, वाइरस से नहीं होती है, इसको कण्ट्रोल किया जा सकता है।

#राष्ट्रीय टीबी नियंत्रण कार्यक्रम वर्ष 1962 में मामलों का जल्दी से जल्दी पता लगाने और उनका इलाज करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। जिले में, #जिला तपेदिक केंद्र (DTC) और प्राथमिक स्वास्थ्य संस्थानों के माध्यम से कार्यक्रम को लागू किया जाता है। #जिला क्षय रोग कार्यक्रम (DTP)कार्यक्रम के समन्वय और पर्यवेक्षण के लिए राज्य स्तरीय संगठन द्वारा समर्थित है। #संशोधित राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम (RNTCP), प्रत्यक्ष रूप से देखे गए उपचार, लघु पाठ्यक्रम (DOTS) रणनीति के आधार पर, वर्ष 1993 में एक पायलट परियोजना के रूप में शुरू हुआ और वर्ष 1997 में एक राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में शुरू किया गया था, लेकिन वर्ष 1998 के अंत में तेजी से RNTCP का विस्तार शुरू हुआ, जिसका राष्ट्रव्यापी कवरेज वर्ष 2006 में प्राप्त किया गया था।

भारत में टी.बी. को कम करने के लिए विश्‍व बैंक पोषित व विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (WHO) के तकनीकी मार्ग दर्शन तथा टी.बी. अनुभाग, भारत सरकार के सहयोग से संशोधित राष्ट्रीय क्षय नियन्त्रण कार्यक्रम के अन्तर्गत डायरेक्टमली ऑब्जार्वेशन ट्रीटमेंन्टव शॉट कोर्स (डॉट्स प्रणाली) वर्ष 1995 से जयपुर शहर में पायलेट प्रोजेक्ट के रूप में प्रारम्भ की गई। इसके अन्तर्गत क्षय रोगी को चिकित्सा कर्मी की देखरेख में 6 माह तक क्षय निरोधक औषधियों का प्रतिदिन सेवन कराया जाता हैं।

सबसे पहले टी.बी. की जाँच को हाई रिस्क ग्रुप में बाँटना, जिसमें इस तरह के लोग आते हैं :
➤ एचआइवी और वी.ई.
➤ धूम्रपान करने वाले
➤ शुगर, कैंसर आदि से ग्रसित
➤ हॉस्पिटल वर्कर
➤ टी.बी. से ग्रसित
➤ कुपोषित और गर्भवती महिलायें

एनआईएस : जिसमें बी.सी.जी. की वैक्सीन सभी नवजात शिशुओं को जन्म के समय ही लगा दी जाये। अगर छूट जाती है तो एक वर्ष तक लगवा लेनी चाहिए।
निक्षय पोषण योजना : इस योजना के अंदर कन्फर्म टी.बी. के रोगियों को 500 रूपये महीने का प्रोत्साहन दिया जाता है। इसके लिए निक्षय वेबसाइट में अपनी जानकारी देनी होती है। इसके अलावा सरकार द्वारा नेशनल टी.बी. संपर्क हेल्पलाइन भी शुरू की गई है।

जल्दी निदान और इलाज भी इस योजना में जोड़ा गया है। ‘डॉट्स’ नामक दवायें शुरू की गई है, जिसमें पहली दवा चिकित्सक के सामने खानी होती है, और फिर छ: महीने तक यह दवा खानी होती है। यह टी.बी. का कारगर इलाज है। दवा लेने में बिलकुल भी लापरवाही नहीं करनी चाहिए।

➥ टी.बी. की सबसे बड़ी समस्या है कि कभी-कभी दवाईयाँ उस पर काम नहीं करती हैं, इसे ड्रग रेसिस्टेंट टी.बी. कहते हैं। इसके लिए सरकार ने टेस्टिंग के लिए मशीनें और 18-20 महीने का कोर्स है।

➥ हॉस्पिटल में टी.बी. वार्ड में भी क्रॉस वैंटिलेशन की सुविधा का निर्माण किया जाता है, जिससे कि आदमी से आदमी में यह बीमारी का फैलना कम होगा।

➥ भारत का लक्ष्य है 2025 तक टी.बी. मुक्त होना है, जो 90 प्रतिशत तक रूग्णता कम करके और 80 प्रतिशत तक नई घटनाओं को कम करके प्राप्त होगा।

अंत में यही कहना चाहुँगा कि टी.बी. एक ऐसी बीमारी है जिसका आसानी से निदान हो सकता है, सिर्फ धैर्य और अपने चिकित्सक पर भरोसा बनाये रखना पड़ता है। इसीलिए टी.बी. से बचने से के लिए स्वास्थ्य नियमों का पालन करते रहें और टी.बी. मुक्त भारत बनाने में अपना योगदान दें।

टीबी मुक्त भारत अभियान
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2025 तक भारत से टीबी उन्मूलन का आह्वाहन किया है। प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान (पीएमटीबीएमबीए) के तहत सामुदायिक जुड़ाव पर विशेष जोर दिया जा रहा है, व्यक्तियों व संगठनों को पोषण और नैदानिक सहायता के लिए रोगियों को गोद लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

डब्ल्यूएचओ ने वर्ष 1993 में टीबी को वैश्विक आपातकाल घोषित किया। उसने क्षय रोग की चिकित्सा के लिए प्रत्यक्ष प्रेक्षित थेरेपी, छोटा-कोर्स (डॉट्स/डाइरेक्टली ऑब्जर्व्ड शॉर्ट कोर्स), अर्थात् सीधे तौर पर लिए जाने वाला छोटी अवधि के उपचार की स्थापना की तथा सभी देशों से इसे अपनाने की सिफ़ारिश की।

डॉट्स रणनीति के पाँच तत्व
डायरेक्टली ऑब्जर्व्ड थेरेपी शॉर्टकोर्स (DOTS) पाँच अलग-अलग तत्वों से बना है : राजनीतिक प्रतिबद्धता; माइक्रोस्कोपी सेवायें; दवा की आपूर्ति; निगरानी प्रणाली और अत्यधिक प्रभावशाली नियमों का उपयोग और उपचार का प्रत्यक्ष अवलोकन।

तपेदिक या टी.बी. से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ

मैक्रोफेज यह एक प्रकार की प्रतिरक्षा प्रणाली कोशिकायें हैं जो गैर विशिष्ट रक्षा तंत्र के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं जो #रोग-कारकों (Pathogens) के खिलाफ रक्षा की पहली पंक्ति प्रदान करती हैं। ये प्रतिरक्षा कोशिकायें लगभग सभी ऊतकों में मौजूद होती हैं और शरीर से मृत और क्षतिग्रस्त कोशिकाओं, बैक्टीरिया, कैंसर कोशिकाओं और #Cellular debris को सक्रिय रूप से हटाती हैं । #फागोसाइटोसिस प्रक्रिया से मैक्रोफेज कोशिकाओं और रोग-कारकों को मिलाकर नष्ट/रोकते हैं। मैक्रोफेज, हार्मोन उत्पादन, होमियोस्टेसिस, प्रतिरक्षा विनियमन और घाव चिकित्सा सहित शरीर में अन्य महत्वपूर्ण कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाता है।

डॉ. रॉबर्ट कोच
डॉ. रॉबर्ट कोच : 24 मार्च, 1882 को, डॉ. रॉबर्ट कोच ने ‘माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस’ जीवाणु की खोज की घोषणा की जिसके कारण TB होती है। फिजियोलॉजी या मेडिसिन में नोबेल पुरस्कार 1905 में रॉबर्ट कोच को “तपेदिक (TB) के संबंध में उनकी जांच और खोजों के लिए” प्रदान किया गया था।

निक्षय पोर्टल निक्षय को 4 जून, 2012 को https://www.nikshay.gov.in पर लॉन्च किया गया था। अब तक 3.6 लाख से अधिक TB के मरीज इस पोर्टल पंजीकृत हो चुके हैं।

बैसिल कैलमेट-गुएरिन (BCG) तपेदिक (TB) रोग का टीका है। यह शिशुओं और छोटे बच्चों को संयुक्त राज्य अमेरिका को छोड़कर अन्य देशों में दिया जाता है। BCG हमेशा लोगों को TB होने से नहीं बचाता है।

विश्व तपेदिक दिवस या विश्व क्षयरोग दिवस (World Tuberculosis Day) प्रत्येक वर्ष 24 मार्च को ‘विश्व टीबी दिवस’ मनाया जाता है। 24 मार्च, 1882 को, डॉ० रॉबर्ट कोच ने ‘माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस’ जीवाणु की खोज की घोषणा की। विश्व टीबी दिवस दुनिया भर में टीबी के प्रभाव के बारे में जनता को शिक्षित करने का दिन है।

निक्षय मित्र वर्ष 2025 में देश से टीबी रोग के खात्मे को लेकर सरकार विभन्न उपायों पर काम कर रही है। टीबी रोग के उन्मूलन में सामान्य नागरिक, जनप्रतिनिधि, गैर सरकारी संस्थान, कॉर्पोरेट संस्थान सहित अन्य संस्थायें अपनी मजबूत भागीदारी निभा सकते हैं। सरकार इसके लिए “निक्षय मित्र” बनने का मौका दे रही है। इसमें कोई भी व्यक्ति टीबी रोगी को गोद ले सकता है। इस अभियान के तहत निक्षय मित्र बनने वाले व्यक्ति या संस्थान मरीजों को पोषण, डायग्नोस्टिक और रोजगार के स्तर पर उनकी मदद कर सकते हैं। जिला यक्ष्मा केंद्र ने अपील की है कि जनपद के लोग, जन-प्रतिनिधि और विभिन्न संस्थायें निक्षय मित्र बनकर टीबी रोगियों की सहायता करने का संकल्प लें।

“समाज का प्रत्येक सक्षम व्यक्ति टीबी रोगियों की सहायता के लिए निक्षय मित्र बनने का संकल्प ले। लोग इस राष्ट्रीय अभियान में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सच्ची मित्रता निभाएं। इस अभियान में सभी सरकारी विभागों, निर्वाचित प्रतिनिधियों राजनीतिक दलों गैर सरकारी संगठनों और कारपोरेट संस्थानों का सहयोग अपेक्षित है।”  : डॉ. धन सिंह रावत, स्वास्थ्य मंत्री

साभार : आकाश जोशी
MBBS (Intern)

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Ghanshyam Chandra

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