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गंदे पानी और गंदी हवा गंदी राजनीति का प्रतिफल

अजीत द्विवेदी
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण की भयावहता बताने के लिए वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई के आंकड़े बताए जाते हैं। मीडिया में भी यही दिखाया जाता है कि एक्यूआई तीन से सौ ऊपर पहुंच गया तो ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान यानी ग्रैप का दूसरा चरण लागू हो गया। एक्यूआई चार सौ पहुंच गया तो ग्रैप का तीसरा और साढ़े चार सौ से ऊपर हो गया तो चौथा चरण लागू हो गया। चौथे चरण में स्कूल और कॉलेज बंद कर दिए गए।

निर्माण और तोड़ फोड़ की गतिविधियां रोक दी गईं। बीएस 3 या बीएस 4 गाडिय़ों पर पाबंदी लग गई। सडक़ों पर पानी का छिडक़ाव हो रहा है आदि, आदि। लेकिन इनसे न तो प्रदूषण की वास्तविक भयावहता का पता चलता है और न यह पता चलता है कि लोगों की सेहत पर इसका क्या असर हो रहा है। यह भी पता नहीं चल पाता है कि सरकारें किस तरह से इसके लिए जिम्मेदार हैं और कैसे इसे ठीक करने के लिए वो कुछ नहीं कर रही हैं।

सबसे पहले तो आंकड़े पर ही बात करें तो एक्यूआई की अधिकतम सीमा भारत में पांच सौ तय की गई है। यानी यहां स्केल ही पांच सौ का बनाया गया है। तभी किसी भी सरकारी उपकरण से मापने पर एक्यूआई पांच सौ से ऊपर नहीं आएगा। इस वजह से यह कंफ्यूजन हुआ कि आईक्यूएयर जैसे ऐप या दूसरे ऐप एक्यूआई 19 सौ या उससे ज्यादा बता रहे हैं तो किसको सही माना जाए। असल में निजी ऐप का कोई स्केल नहीं बनाया गया है तो हवा का प्रदूषण जितना बढ़ता जाता है उतना उसका सूचकांक ऊपर जाता है। लेकिन भारत में पांच सौ का स्केल बना दिया गया है तो सरकारी आंकड़ा उससे ऊपर जाएगा ही नहीं।

पांच सौ है इसका मतलब है कि अधिकतम सीमा पहुंच गई है। लोग इसका मतलब इतना ही समझते हैं कि हवा सर्वाधिक प्रदूषण हो गई है। लेकिन असल में कितनी प्रदूषित हुई है और उसका क्या असर हो रहा है यह समझने के लिए आंकड़ों की बारीकी में जाना होता है। पुरानी कहावत है कि ‘ब्यूटी लाइज इन डिटेल्स’ उसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि ‘डेंजर लाइज इन डिटेल्स’।

एक्यूआई मुख्य रूप से पार्टिकुलेट मैटर्स यानी पीएम से तय होता है। पार्टिकुलेट मैटर्स हवा में लटके हुए हानिकारक कण होते हैं, जो सर्दियों में प्रदूषण की वजह से नीचे आ जाते हैं और स्थिर हो जाते हैं। ये दो तरह के होते हैं। एक पीएम 10 है और दूसरा पीएम 2.5 है। 2.5 माइक्रोन से ज्यादा आकार के कणों को पीएम 10 कहा जाता है। ये थोड़े मोटे कण होते हैं, जो शरीर के लिए हानिकारक होते हैं लेकिन पीएम 2.5 बहुत बारीक कण होते हैं और शरीर को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले होते हैं। 2.5 माइक्रोन से कम आकार वाले पार्टिकुलेट मैटर को पीएम 2.5 कहा जाता है।

ये बड़ी आसानी से सांस के साथ शरीर में चले जाते हैं और फेफड़े व शरीर के दूसरे महत्वपूर्ण अंगों तक पहुंच कर उसको नुकसान पहुंचाते हैं। लंग्स कैंसर या दूसरे कई किस्म के कैंसर में इसका बहुत बड़ा योगदान होता है। इनसे 10 से 15 साल के बच्चों के फेफड़ों की काम करने की क्षमता 20 फीसदी तक कम हो रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली की अभी की हवा में बाहर अगर कोई एक घंटा भी सांस लेता है तो फेफड़े पर असर के साथ साथ हृदय रोग की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

इसका मतलब है कि पीएम 10 और पीएम 2.5 का ज्यादा मात्रा में शरीर के अंदर जाना सिर्फ फेफड़े को नुकसान नहीं पहुंचा रहा है, बल्कि हृदय सहित दूसरे महत्वपूर्ण अंगों को भी नुकसान पहुंचाता है। दिल्ली की हवा में इसकी मात्रा कितनी है, इससे वास्तविक खतरे का पता चलता है। सोमवार, 18 नवंबर को दिल्ली के मुंडका में हवा में पीएम 2.5 की सघनता 1,193 थी। यानी जहां पांच सौ के स्केल पर एक्यूआई पांच सौ दिखा रहा था वहां पीएम 2.5 की मौजूदगी प्रति घन मीटर हवा में 1,193 थी। नजफगढ़ में 1,117 और अशोक विहार में 1,083 थी। दिल्ली की हवा में प्रति घन मीटर पीएम 2.5 की औसत मौजूदगी नौ सौ से ऊपर थी।

भारत सरकार ने तय किया है कि भारत में प्रति घन मीटर हवा में पीएम 2.5 की मौजूदगी अधिकतम 60 माइक्रोग्राम होनी चाहिए, जो कि दिल्ली में 19 गुना तक ज्यादा है। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अधिकतम सीमा 15 माइक्रोग्राम तय की है और इस लिहाज से दिल्ली की हवा में पीएम 2.5 की मौजूदगी 74 गुना ज्यादा है। यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन, डब्लुएचओ के मानक के मुताबिक प्रदूषण हवा से दिल्ली में लोगों की सेहत को 74 गुना ज्यादा खतरा है।

इस बात को डॉक्टर लोग दूसरी तरह से समझाने की कोशिश करते हैं। वे बताते हैं कि दिल्ली की हवा में सांस लेने का मतलब है रोज 20 सिगरेट या 30 सिगरेट का धुआं अपने शरीर में भरना। एक आंकड़े के मुताबिक दिल्ली में इस समय हर आदमी प्रतिदिन औसतन 38 सिगरेट का धुआं अपने शरीर में भर रहा है। इसके बाद दूसरे स्थान पर जो शहर है वह हरियाणा है, जहां की हवा में सांस लेना हर दिन 25 सिगरेट पीने के बराबर है। सोचें, इसका क्या असर शरीर पर होता है।

इस बात को समझने के लिए एक और मिसाल दी जा सकती है। याद करें 2016 की जनवरी में जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा नई दिल्ली आए और तीन दिन रूके तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया में कूटनीतिक खबरों के साथ साथ एक हेडलाइन यह भी थी कि, ‘मिस्टर प्रेसिडेंड अपनी जिंदगी के छह घंटे कम हो गए’। दिल्ली की हवा में तीन दिन सांस लेकर उनकी जिंदगी का एक चौथाई दिन कम हो गया। यह नौ साल पहले की बात है। उसके बाद तो यमुना के पानी और दिल्ली की हवा में कई गुना ज्यादा जहर घुल गया है।

हकीकत यह है कि एक्यूआई के आंकड़े, विजिबिलिटी के आंकड़े या डायवर्ट होने वाले विमानों की संख्या या देरी से चल रही ट्रेनों की संख्या से वायु प्रदूषण की भयावहता का पता नहीं चलता है। असल में यह बहुत भयावह संकट है, जिससे करोड़ों लोगों का जीवन खतरे में पड़ रहा है। लाखों बच्चे बचपन में ही सांस की बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। हृदय रोग के मरीजों के जीवन पर संकट बढ़ रहा है। लाखों लोगों का जीवन दवा पर निर्भर होता जा रहा है। हर व्यक्ति के जीवन में औसतन तीन से चार साल कम हो रहे हैं।

हर व्यक्ति का मेडिकल का खर्च बढ़ रहा है क्योंकि आंख, कान, नाक और गले से लेकर फेफड़े और हृदय रोग बढ़ते जा रहे हैं। जिस तरह से दिल्ली में पानी प्रदूषण होता गया और हर घर में आरओ लगाने की मजबूरी हो गई वैसे ही हवा गंदी होती गई है और हर घर में एयर प्यूरीफायर लगाने की मजबूरी होती जा रही है। इसके बावजूद गंदे पानी और गंदी हवा से पूरी तरह बचाव नहीं होता है। दिल्ली की गंदी राजनीति का यह अनिवार्य प्रतिफल है, जिसे हर व्यक्ति को भुगतना ही है।

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Ghanshyam Chandra

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