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जल प्रदूषण-एक विकट समस्या

जल प्रदूषण-एक विकट समस्या

भारत देश को सोने की चिड़ियाँ नाम से भी जाना जाता था। भारतवर्ष में धन संपदाओं का भंडार है, जरूरत ​है तो सिर्फ इन संपदाओं को व्यवस्थ्ति ढंग से प्रयोग में लाने की तथा इनके संरक्षएा की। आज से कुछ समय पहले की बात करें तो तब विकास अधिक नहीं हुआ था लेकिन हमारा भारतवर्ष तब और अधिक सुरक्षित था। आज हमारे देश में विकास के साथ-साथ समस्याओं का भी आवरण हो रहा है। कहने का अर्थ है कि आज हमारे देश में जल प्रदूशण, वायु प्रदूाशण, ध्वनि प्रदूशण, आपसी भेदभाव, जातिवाद या फिर वंशवाद, ये सभी समस्यायें हममें से ही निकलकर बाहर आ रही हैं। हमारे देश की ही नहीं, जल प्रदूषण एक विश्वव्यापी समस्या बन गयी है। जल प्रदूषण का अभिप्राय है-जल के प्राकृतिक गुणों में गिरावट। जल प्रदूषण वह क्रिया है जिससे जल में विभिन्न बाह्य स्त्रोतों से आकर मिलने वाले ऐसे हानिकारक पदार्थ जो जल को मानवीय उपयोग की दृष्टि से अनुपयुक्त बना देते हैं। जब बाहरी क्षेत्र से जल में कोई ऐसा पदार्थ आता है जिससे पानी के मूल रूप में गिरावट आ सकती है तो उससे जल प्रदूष्ण बढ़ता जाता है। इस जल को पीने से मानव के स्वास्थ पर भी असर होता है, वह बीमार होने लगता है। जबकि इसका कारण भी स्वंय मनुष्य ही है। वर्तमान समय में इस समस्या को लेकर केवल भारतवर्ष् ही नहीं बल्कि पूरा विश्व चिंतित है। कुछ स्त्रोत जो मानव द्वारा ही बनाये गये हैं, ऐसे हैं जिनके कारण जल प्रदूषण पूरी तरह से सक्रिय हो गया है। आज मनुष्य अपने स्वार्थ के लिये कुछ भी करने को तैयार रहता है, वह यह नहीं सोचता कि इस कार्य का क्या परिणाम हो सकता है। वह आज पैसे के आगे पूरी तरह नतमस्तक हो जाता है। आज मानव प्रतिदिन मल-मूत्र, कूड़ा-करकट तथा अन्य पदार्थों को अनियोजित ढंग से विसर्जित करता है। ये सब नालियों से गुजरते हुये नदियों, तालाबों या फिर इन सबसे आगे बढ़कर समुद्रों में चले जाते हैं। नदियों और तालाबों का पानी मनुष्य भी प्रयोग करता है और फिर उसी पानी के प्रयोग से बीमार भी होता है। अकेले दिल्ली में एक दिन में नालों से लगभग 25000 लीटर गंदा पानी यमुना नदी में मिलता है, जब एक दिन में इतना पानी मिलता है तो हम खुद ही समझ सकते हैं कि इतने वर्ष हो गये हैं भारतवर्ष को आजाद हुये और तब से अब तक न जाने कितने विकास कार्य हुये और न जाने कितनी जनसंख्या बढ़ी, तो समझ लीजिए भ्रारतवर्ष की नदियों को कितना नुकसान नहीं पहुॅचा होगा। आज ज्यादातर नालों और सीवर लाइनों का जल नदियों में ड़ाला जाता है और लोग इन्हीं नदियों के जल हो नहानेे, कपड़े धोने, व बर्तन धोने और पीने के लिये भी प्रयोग करते हैं। उत्तर प्रदेश की गंगा, यमुना तथा गोमती नदियाॅ गंभीर जल प्रदूषण से ग्रसित हैं। आज भी करोड़ों लीटर सीवरेज तथा औद्योगिक कचरा गंगा में डाला जा रहा है। सबसे शुद्ध व अपेक्षाकृत स्वच्छ माने जाने वाले स्थानों, हरिद्वार और ऋषिकेष में भी जल प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि अब ये स्थान भी स्वच्छ नहीं रह गये हैं। गंगा की सफाई के लिये उत्तराखण्ड़ सरकार द्वारा कई बार वादे किये लेकिन कुछ दिनों तक यह वादे याद रहते हैं, और फिर सब अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं। हालांकि देहरादून व आस-पास के स्कूलों के बच्चों ने भी गंगा सुरक्षा अभियान चलाया, लेकिन जब तक सारे लोग एकत्रित होकर यह निश्चय नहीं कर लेते कि उन्हें माॅ गंगा और अन्य सभी नदियों व जलाशयों को स्वच्छ रखना है तो तब तक कोई अकेले कैसे सफाई अभियान चला सकता है। मनुष्य अपनी व्यक्तिगत एवं घरेलू स्वच्छता का बहुत ध्यान रखता है इसके लिये वह एक ओर साबुन, वाशिंग पाउडर, सोडा तथा पैट्रोलयुक्त कार्बनिक पदार्थों का प्रयोग करता है, वहीं दूसरी ओर मच्छरों, चूहों, खटमलों आदि को मारने के लिए कीटनाशक पदार्थों का प्रयोग भी करता है। इन सभी पदार्थों का अधिकांश भाग घरों की नालियों से होकर नदियों तथा जलाशयों में पहुॅचता है, जिससे जल प्रदूषित होता है। भारतवर्ष में आज उद्योग जगत बड़ी तेज गति से विकास कर रहा है। वस्त्र उद्योग, कागज उद्योग, लौह इस्पात उद्योग, तथा पेट्रोरसायन उद्योग आदि ऐसे उद्योग हैं जिनके औद्योगिक अपशिष्ट जल में प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। इन औद्योगिक अपशिष्टों में पारे की लवणता, आर्सेनिक, फाॅस्फोरस, सीसा तथा फिनोल आदि सर्वप्रमुख हैं, जो नालियों द्वारा जलाशयों में जाकर पानी को गंदा ही नहीं करते अपितु मानवीय स्वास्थ पर दीर्घकालिक हानिकारक प्रभाव भी डालते हैं। भारत में जहाॅ पहले गोबर की खाद का प्रयोग किया जाता था आज उसी कृषि प्रदान देश में कृषि के लिये किसान रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों का प्रयोग कर रहा है। वर्षाकाल में इन कीटनाशक पदार्थों तथा रासायनिक उर्वरकों का अधिकांश भाग वर्षा के जल में बहकर नदियों में मिल जाता है। जिससे जल प्रदूषित होता है। जीवाश्म ईंधन के जलाने से भी जल प्रदूषण होता हैा। इसी प्रदूषित जल को मनुष्य जब पीता है तो उसे त्वचा रोग, पीलिया, टाइफाइड़ बुखार, जैसी जल से उत्पन्न होनी वाली बीमारियाॅ हो जाती हैं। प्रदूषित जल में निवास करने वाले जलीय जंतुओं को भी खतरा हो गया है। बहुत से जलीय जीव-जंतु स्वच्छ जल के अभाव की वजह से विलुप्त होने की कगार पर भी हैं। सागर व महासागरीय क्षेत्रों में बढ़ते जल प्रदूषण तथा तैलीय पदार्थों के सागरीय सतह पर फैल जाने से सागरीय जल में आॅक्सीजन की कमी हो जाती है, जिसके कारण जलीय जीव-जंतु विशेष रूप से मछलियाॅ मर जाती हैं। भारत में जल संरक्षण के लिये सरकार द्वारा कुछ महत्वपूर्ण योजनायें भी बनाई गई हैं जिनमें से गंगा कार्य योजना, यमुना कार्य योजना, राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना, गंगा सुरक्षा अभियान आदि मुख्य हैं। गंगा को भारत की पवित्र नदी माना जाता हैा। गंगा नदी के आस-पास के नगरों में बड़े-बड़े उद्योगों के लग जाने से वहाॅ का प्रदूषित जल गंगा नदी में डाला जाता है और जिसकी वजह से आज गंगा अत्यधिक प्रदूषित हो गई है। सन् 1985 में भारत सरकार द्वारा गंगा नदी के जल को प्रदूषण मुक्त रखने के लिये गंगा कार्य योजना को प्रारम्भ किया था। सन् 1993 में भारत सरकार द्वारा यमुना नदी की स्वच्छता को बनाये रखने के लिये यमुना कार्य योजना के कार्यान्वयन को स्वीकृति दी। इस योजना का प्रमुख उद्देश्य यमुना नदी के तट पर स्थित कई नगरों के गन्दे वाहित जल को यमुना में सीधे डालने से रोकना और उसकी दिशा को परिवर्तित करना है। भारत में नदियों के जल को प्रदूषण से मुक्त रखने के लिये सन् 1995 में राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना को प्रारम्भ किया गया। इस योजना के अन्तर्गत भारत की प्रमुख नदियों को प्रदूषण से मुक्त करने के अलावा सतलज, साबरमती, महानदी, नर्मदा, गोदावरी, आदि नदियों के जल की स्वच्छता को कायम रखने की कार्य योजना है। इसी प्रकार की और भी योजनायें भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही हैं, लेकिन जब हम खुद नदियों के आस-पास जाकर देखते हैं तो ये योजनायें बिल्कुल बेअसर नजर आती हैं। मनुष्य जिस प्रकार अपने घरों की सफाई रखता है अगर उसी प्रकार वह इन नदियों को भी सुरक्षित रखने की कोशिश करेगा तो किसी भी नदी या जलाशयों में प्रदूषण नहीं होगा। लेकिन आज मनुष्य इन सभी कामों से परे अपने स्वार्थ के लिये इन नदियों की पवित्रता को भी भूल चुका है। जल प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिये कुछ उपाय किये जा सकते हैं। जैसे –
1. नदियों तथा जलाशयों में मलविर्सजन एवं औद्योगिक अपशिष्टों के विर्सजन पर पूर्णतया प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिये।
2. घरेलू व औद्योगिक वाहित गन्दे जल को सीवेज ट्रीटमेंट संयंत्रों में पूर्ण उपचार करने के बाद ही नदियों व सागरीय भागों में छोड़ा जाय।
3. नदियों के जल को पीने योग्य बनाने के लिये वैज्ञानिक विधियों से जल संयंन्त्रों में शुद्धीकरण किया जाना अनिवार्य कर दिया जाय।
4. आम नागरिकों को जागरूक किया जाय तथा जल प्रदूषण से होने वाली बीमारियों के बारे में जानकारी दी जाय।
5. झीलों तथा तालाबों के जल को शुद्ध रखने के लिये शैवालों का प्रयोग करना आवश्यक है। यह शैवाल जलाशयों की गन्दगी को बड़ी मात्रा में बिना किसी गंभीर हानि के पचा लेती है।
6. प्रदूषित पदार्थों को महानगरों में गिराये जाने पर प्रतिबन्ध लगाया जाय तथा महानगरों में विस्फोटों पर सख्ती बरती जाय।
7. कृषि कार्य के लिये किसानों को समझाया जाय कि उन्हें कीटनाषक दवाओं व रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग न करके गोबर व नीम की खाद का प्रयोग करना चाहिये।
8. जलाशयों के समीपवर्ती भागों में कूड़ा-करकट डालने पर सख्ती बरती जाय। साथ ही मृत जीव-जंतुओं को नदियों के आस-पास फेंकने पर प्रतिबंध लगाया जाय।
9. जलाशयों में जंतुओं को नहलाने पर भी प्रतिबंध लगाया जाय, लोग अपने जानवरों को नदियों या जलाशयों के बीचों-बीच ले जाकर उसे साबुन से नहलाते हैं, जिससे सारी गंदगी पानी में मिल जाती है और जल प्रदूषित होता है।

जल ही जीवन है,
जल को प्रदूषित नहीं होने दें।
जल को संचय करें।
जल संचय जीवन संचय।

 

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Ghanshyam Chandra

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