कांटली : उत्थान, अब पलायन………..

साभार : ऑनररी कैप्टेन श्याम सुन्दर काण्डपाल
कांटली : एक ग्राम जो अपने आप में परिपूर्ण है।
आकाश ज्ञान वाटिका, शनिवार, 13 जून 2026, कौसानी/देहरादून। कांटली ग्राम जो कोसी नदी के उदगम के पादुका में बसा है, जहाँ से कोसी नदी कलरव करती हुई बड़ी चंचलता से अपनी यात्रा पर निकलती है। कांटाली ग्राम श्री पिनाकेश्वर मंदिर के तलहटी पर बसा है तथा श्री रुद्रधारी जिसकी हमेशा रक्षा करते हैं। पूर्व में विशालकाय कौसनी की पहाड़ी जो बाहरी दुनिया की बुरी नजर से ग्राम को बचाती है। उत्तर में कत्यूर घाटी की शृंखलायें तथा दक्षिण में मठ जहाँ निर्वाण प्राप्त होता है। यह ग्राम अपने आप में परिपूर्ण है। पूर्णतः कांडपाल और कुछ भट्ट और कुछ कास्तकार परिवार यहाँ बसे है। कोसी नदी के तलहटी से प्राप्त ज़मीन बहुत उपजाऊ है। यहाँ धान, गेहूँ, मडुआ व आलू तथा बरसात में सभी प्रकार की सब्जियाँ बहुतायत होती हैं। कोसी नदी की घाटी होने के कारण प्रायः ठंड बनी रहती है।

कांटली ग्राम के ब्राह्मणों का इतिहास उत्तराखंड के ब्राह्मणों से मेल खाता है। कास्तकर परिवार यहाँ कई शताब्दियों से रहते आये हैं। जो धीरे-धीरे बढ़ते गए। आज कांटाली गाँव मे 250 से 300 घर हैं। ग्राम के निवासी पूरी तरह खेती पर निर्भर थे। ब्राह्मण परिवार कत्यूर काल में पुरोहित का कार्य कर अपनी आजीविका चलाते थे। कत्यूर राजाओं ने कांटाली के ब्राह्मणों को अपना पुरोहित स्थापित किया था तथा यह परंपरा अभी तक चली आ रही है
जनसंख्या : कांटली ग्राम की जनसंख्या लगभग अनुमान के अनुसार 700 से 800 तक है।

कृषि तथा वानिकी :
कांटली ग्राम में धान, गेहूँ, मडुआ, आलू खूब मात्रा में होता है जो हर परिवार को अन्न की कमी नहीं होने देता है। कांटली ग्राम में सीजन की सब्जी, लोकी, तोराई, सिमी (बीन्स), ककड़ी, मिर्ची, गडेरी, पिनाऊ काफी मात्रा में होता हैं और कुछ परिवार तो गोभी, बैगन, शिमला मिर्च आदि फसलों को भी उगाते हैं। गाँव की खेती तीन भागों में विभाजित है।
क्षेत्रफल : (अनुमानित)
(अ) तलाओं लगभग : 400 नाली
(ब) उपराओं लगभग : 350 नाली
(स) पासेरी लगभग : 250 नाली
ग्राम के पास बंजर भूमि बहुत अधिक मात्रा में है जिसका प्रयोग मवेशियों के घास के किया जाता है।
कांटली ही कुमाऊँ क्षेत्र में ऐसा एक मात्र गाँव होगा जहाँ एक सेरा हमेशा मवेसियों के लिए खुला रहता है। चौमास में पूरे सेरे में खेती होती है। गाँव की मुख्य बान (नहर) जो सीम तक जाती है, पूरे सेरे को सिंचती है। बजयारी के लिये अलग बान है। आषाढ़ माह में अगर वर्षा देर से हो तो पानी की कमी हो जाती थी और लोग रात भर जगकर सिंचाई करते थे, फिर अगर ज्यादा बारिस हो जाये तो बोल (नहर) निकाल कर खेत का पानी कम करते थे। गाँव में धान को तीन तरह से बोया जाता है। एक रोपाई द्वारा तथा दूसरा खेत में पानी भरकर तैयार किया जाता है, फिर धान छीरक दिया जाता है, इसे साई कहते हैं, और तीसरा उपरू। धान में मुख्य प्रजातियाँ थापचीनी, दमरुड़, साव होता है। बाद में ब्लॉक द्वारा परिक्षणकृत बीज दिए जाने से और प्रजातीय भी प्रचलन में आने लगी। जब पूरा सेरा धान के पोधों से भर जाता था। दो सेरे में धान से, ऊपराओं में मड़ुआ या धान पासेरी में धान, सावन भादों में पूरा सेरा बड़ा ही मनोरम लगता है। जैसे धरती माँ हरे रंग की साड़ी ओड़कर बैठी हो और उसमें हल्का सरसों का रंग चढ़ा हो और जब हवा चलती है तो ऐसा लगता है जैसे माँ साड़ी सुखा रही हो और उसे हवा में सभाल रही हो।

पूरा गाँव अनायास ही सेरे के तरफ देखता है और फिर ऊपर आसमान की तरफ देखता है और कहता है “अलवेर धान भाल हैरई” भगवान की कृपा रही तो फसल अछी होगी। महिलायें खेतों के किनारे घास काटते बहुत खुसी से खेतों को निहारते और जैसे मन ही मन कह रहे हों हमारी मेहनत का फल है। खेतों की देखभाल ज्यादातर महिलायें ही करती थीं, जैसे मौन वर्गीकरण हो कि घर और खेत मैं देखूँगी और आप (पुरुष) बाहर के काम जैसे नौकरी, जजमानी, मिस्त्री, आदि काम। पशु की देखभाल पुरुष और स्त्रियाँ मिल कर करते थे। यह घर की व्यवस्था आदि काल से चली आ रही है। घर की अर्थव्यवस्था, इससे सूद अर्ण होती थी। हर घर की आर्थिक स्थिति लगभग एक जैसी थी। घर की संपन्नता, कितने खेत हैं, इस पर निर्भर थी। अच्छी फसल सभी को आर्थिक भरोसा प्रदान करती थी। उधर घर के बाड़े भी खूब सज गए हैं। आर्डू, खुबानी, चुवारु पक गए हैं। ककड़ी, लौकी, तुरई, गेठे के झाल फैल रहे हैं । उन्हें जमीन कम पढ़ रही है और ठागर के द्वारा आकाश की तरफ बड़ रहे हैं। कद्दू की बेल जैसे बोल रही हो की सारी जमीन मेरी है, मैं घेर लूँगा। परंतु पड़ोसी उसे लौटा रहे हैं। घास अनायास ही बड़ गई है। अच्छी घास होना भी बहुत हर्ष का विषय होता था। मवेशी साल भर खायेंगे, जंगल कम जाना पड़ेगा, महिलायें मन ही मन सोचती हैं।
कुल मिलाकर एक परिपूर्ण आर्थिक व्यवस्था और सामाजिक व्ययस्था कांटाली में विद्यमान थी। लगभग हर घर एक समान सम्पन्न था। यह सिलसिला २०१५-२० तक चला। पुरुष नौकरी के लिये मैदानी क्षेत्रों में जाते, कुछ वही बस गए तो कुछ वापस गाँव आ गए, पर खेती की व्यवस्था लगभाग चलती रही। इसका कारण था, अच्छी पैदावार होना।
पशु पालन
हर घर में एक या दो भैसें होती थी और एक बैल, एक-दो गाय। दूध-दही हमेशा घर में रहता था। यह भी अर्थव्यवस्था का बहुत बड़ा आयाम था। जिसमें रुपए मिलते थे, जो घर के बाकी कामों में उपयोग में आते थे।
वातावरण
घाटी में बसे तथा चारों तरफ जंगलों से घिरे होने के कारण गाँव में साल भर ठंड बनी रहती है। श्री पिनाकेश्वर की तलहटी मैं बांझ, काफल के पेड़ बहुतात्यात में पाए जाते हैं, जिससे शीतलता बनी रहती है और बाकी जगह की अपेक्षा बरसात बहुत होती है। कोसी नदी कलरव करती हुई तथा अपने दोनों किनारों के खेतों को अद्रता प्रदान करती है। सर्दियों में प्रायः हिमवर्षा होती है और बरसात में कोसी नदी अतर हो जाती है। कोसी में पानी कम हो या ज्यादा हमेशा शोर (सायं-सायं) करती है। रात को कोसी नदी का शोर लोरी की तरह होता है जिससे नीद आने में मदद होती है। जैसे कोसी कह रही हो गाँव वालों सो जाओ मैं जगी हूँ चिंता मन करो, पर आज कोसी नदी भी सो गई है, उसका शोर भी सो गया, जैसे कह रही हो “तुम लोग दिन में भी सोने लगे हो, अगर सब सो रहे हैं तो मैं जग क्या करू”।

पलायन तथा कारण
गाँव से जो लोग बाहर नौकरी करने के लिए गये, साल दो साल में एक बार घर आते और अपने साथ श र का परिवेश लाते । वे कुर्ता पैजमा की जगह ट्रैक सूट पहनते तथा मैदानी क्षेत्रों के परिवेश की चर्चा करते। युवक व युवतीय मैदानी क्षेत्रों मैं काम करने के लिया, उत्साहित रहते तथा खेतों की तरफ झुकाव कम होने लगा। गाँव के मुक्त व पवित्र वातावरण को छोड़कर शहर की तंग गलियों व भयानक गर्मी को सहने के लिये मजबूर थे।
युवकों का मुख्य आकर्षण फौज या B.Ed. करके शिक्षक और कोई विभाग लगभग अनजान था। जैसे सिवल परीक्षा की तैयारी और कुछ तकनीक काम लगभग अनभिज्ञ थे ।
फौज में जाते ही युवकों की शादी की समस्या पैदा होने लगी, युवतिया गाँव के परिवेश में नहीं रहना चाहती। उनकी तरफ से यह कहा जाने लगा कि मैदानी क्षेत्रों में घर या जमीन आवश्यक है तभी शादी होगी। कुछ लोगों ने जमीन ले ली, कुछ लोग किराये के मकान में मैदानी क्षेत्रों में रहने लगे। देखादेखी शिकक्ष तथा और विभाग के लोग भी इसी परिपाटी को अपनाने लगे और देखते ही देखते गाँव का मुख्य वर्क फोर्स गाँव से बाहर रहने लगा और उनकी खेती धीरे-धीरे बंजर होने लगी।
यहाँ पर मैं इतना कहना चाहुँगा कि महिलाओं ने दूर दृष्टि नहीं दिखाई, वो चाहे तो अपने घर को आर्थिक रूप से सशक्त कर सकती हैं पर उनका कहना है कि गाँव में उचित सिक्षा का अभाव है। यह सच भी है। वो अपने बच्चों के भविष्य के लिए चिंतित हैं। यहाँ पर मैं प्रशासन की विफलता मानता हूँ जो कि उन्होंने समय रहते शिक्षा के क्षेत्र में उचित कदम नहीं उठाए। जबकि स्कूल है, अध्यापक है, पर उचित दोहन नहीं हो पाया। समाज में जागरूकता का अभाव और सामाजिक संस्थाओं का उदासीन होना बहुत चिंता का विषय है। इसका कारण जो भी हो इससे पहाड़ के बच्चों के बौद्धिक क्षमता को धक्का लग रहा है।
जिन्हें कोई काम नहीं मिला वो जजमानी, मिस्त्री, घरेलू काम आदि करने लगे। यह एक और समस्या खड़ी हो गई कि जजमानी करने वाले उन लड़कों की शादी मैं रुकावट होने लगी और अगर हो भी गई तो उन्होंने भी अपने परिवार को मैदानी क्षेत्रों में किराये के मकान में रखना पड़ रहा है। उनकी महिलायें खेतों के काम में रुचि नहीं रख रही हैं। पुरुष आधा दिन तास, सोशल मीडिया, नशा आदि चीजों में अपना समय बर्बाद कर रहा है। पलायन के मुख्य कारण जो कहे जाते है कि उचित शिक्षा व्यवस्था नहीं हैं, रोजगार नहीं है, उपचार नहीं हैं। सोशल मीडिया के आने से यह स्थिति और जटिल हो गई। लोग अब लाइफ स्टाइल की बात करने लगे। परिवार, गाँव की जड़ें हिलने लगी। महिलाओं की विचारधारा में बदलाव होने लगे। कास्तकर गाँव से धीरे-धीरे अलग होने लगा और उनके बच्चे भी शहर में काम करने लगे और खेतों के काम में अरुचि दिखाना शुरू कर दिया और ऐसी हालत हो गई है कि एक गाँव होते हुए भी, एक-दूसरे को पहचानते नहीं। इस सामाजिक रचना के लिए अलग से शोध की आवश्यकता है। मेरा विचार है कि समाज का यह हिस्सा धीरे-धीरे अलग हो जाएगा जो कि भविष्य में संघर्ष का कारण भी बन सकती है। उत्तराखंड में सामाजिक सद्भाव हमारी विरासत है और वैदिक काल से चली आ रही है। इसका पालन और परिपोषित करना चाहिए। समय के अनुसार बदलाव होने चाहिए। प्रशासन को उचित सुझाव देने चाहिए और समाज के वरिष्ठ लोगों की भी अहम भूमिका है। मैं महात्मा गाँधी जी के शब्दों को याद करता हूँ “Future depends on what you do today“ और श्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में “यही समय है सही समय है कही देर न हो जाय“।
जानवरों और मनुष्यों का संघर्ष
एक और आयाम है जो हम आए दिन समाचारों में सुनते हैं कि जंगली जानवर मनुष्यों पर हमले कर रहे हैं और बंदर और बारह खेती को चॉपट कर रहे हैं। ये जानवर पहले भी थे और खेती भी थी फिर अचानक यह जानवर आने लगे और भयावह स्थिति कैसे पैदा हो गई। मेरा विचार है कि यह साधारण सा सिद्धांत है कि हर प्राणी अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाता है, इसमें मनुष्य भी है। जैसे-जैसे जिसका प्रभाव बढ़ेगा उसकी ताकत भी बढ़ेगी और वो अपने प्रभाव क्षेत्र में मनमानी करेगा। मनुष्य का प्रभाव अपने क्षेत्र, खेत, सेरा, घास के जंगल आदि में कम होता जा रहा है तो जानवरों का प्रभाव बढ़ रहा है। साधरण सी बात है जहाँ हमारे खेत थे अब वो बंजर हो गए हैं तथा वहाँ झाड़ पैदा हो गए और वहाँ जानवर रहने लगे और सवछन्द विचरण करने लगे और कभी न कभी एक दूसरे के प्रभाव क्षेत्र में टकराने से संघर्ष पैदा होता है।
चिंता
जिन बुजुर्गों ने अथक परिश्रम कर के इन खेतों को आबाद किया था और देर सवेर आबाद होंगे की नहीं, पर आज की स्तिथि देखकर कहते है “हमूल इन गड़ा (खेत) में आपूर्ड भाट टोर राखी और खून जले रखों, आज यू बंजर हैरई। धर्तीक श्राप लागल।“ पर कैके लागल। साबुके लागल।
पर चिंता है कि हरा-भरा क्षेत्र कभी पूरे गाँव का भरण-पोषण करता था अब धीरे-धीरे बंजर हो जायगा। जो उपजाऊ जमीन प्रदेश की अर्थव्यवस्था को योगदान देता था और ऐसे कई गाँव धीरे-धीरे बंजर हो जायेंगे और जो कुछ लोग गाँव में बसे हैं वो भी शहर की तरफ चले जायेंगे। क्या इतना सुंदर गाँव भुतहा बन जायेगा। सोच कर भी डर भी लगता है। गाँव के लोग अपने पुश्तैनी घर को छोड़कर सड़क के किनारे घर बनाने लगे हैं। धीरे-धीरे पूरा गाँव नई जगह बस जाएगा।

आज की स्थित
आज की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है । लगभग ५० % सेरा बंजर हो गया है और जो खेत आबाद हैं वो भी नहीं के बराबर, बाद में घास काट ली जाती है। किसी के पास भैस नहीं है। दूध अब बाजार से आता है। गाँव की बान (नहर) अस्त-व्यस्त है जो थोड़ी बहुत खेती हो रही है वो वर्षा पर निर्भर है। गाँव से लोग पलायन कर चुके हैं। घर में ताला लगा है। साल में एक बार आते हैं फिर ताला मार के चले जाते हैं और गाँव धीरे-धीरे भूतहा गाँव में परिवर्तित हो रहा है। अब हर परिवार सरकार द्वारा प्रायोजित राशन को अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानकर भरण पोषड़ कर रहा है । और जो भी कमाई है उससे घर के बाकी समान खरीद कर अपने स्मार्ट फोन मे व्यस्त हैं और वो इस प्रयास में है कि कब गाँव छोड़ कर जायें।
जो भी अभी गाँव में मौजूद हैं, वे भी व्यवस्थित नहीं हैं और उनके पास कोई भविष्य की योजनायें नहीं हैं। बस अपने समय को धीरे-धीरे निकाल रहे हैं।
घर-परिवार, पति-पत्नी, बच्चों व माँ-बाप, भाई-बहिन, ये सब घर की समृद्धि में अपना योग-दान देते हैं। केवल धन अर्जित करने वाला सदस्य ही घर में समृद्धि नहीं ला सकता है। समृद्धि लाने के लिए घर के हर सदस्य को अपनी योग्यता के अनुसार योग-दान करना पड़ता है तभी वह घर समृद्ध बन सकता है। जब घर में कमाने वाले सदस्य कम हों और उपयोग करने वाले ज्यादा, तो परिवार संतुलित नहीं रहता है। घर के हर सदस्य का योगदान गाँव में धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। शहर में स्त्री और पुरुष बराबर धन अर्जित करते हैं, साथ में बच्चों की देखभाल भी करते हैं और यह गाँव के परिवेश में भी होता था। जैसे खेती के अलावा सब्जियों का उत्पादन, गाय व भैस का पालन कर धन अर्जित करते थे। ये सब कार्य परिवार के हर सदस्य के लिया निर्धारित थे पर आज कल गाँव में इसकी उपयोगिता कम हो गई गई है जो चिंता का विषय है। इस विषय पर समाजविदों को समाज को उचित दिशा-निर्देश देने चाहिए तथा कार्यशालायें आयोजित करनी चाहिए, जिनमें विभिन्न कार्यों को सिखाया जाए।
एक उदाहरण के साथ अपनी बात कहना चाहता हूँ। एक व्यक्ति, जो 40 साल सरकारी नौकरी करने के बाद अब सेवानिवृत्त होने वाले हैं उनके घर में पत्नी, बेटा और बहू हैं। खेती पूरी तरह बंजर हो चुकी है। बेटा छोटे-मोटे काम करके कुछ पैसे कमा लेता है। बहू घर पर सास के साथ रहती है। वे खेती नहीं कर रहे हैं और न ही गाय-भैंस पाल रहे हैं।
अब प्रश्न यह है कि इस परिवार की समृद्धि कैसे होगी ? जिंदगी तो किसी तरह कट ही जाएगी, लेकिन आने वाली पीढ़ियों का क्या होगा ? वे भी फिर वही संघर्ष करेंगे। जबकि कुछ पशु पाले जा सकते थे, थोड़ी-बहुत सब्जियाँ उगाई जा सकती थीं, और भी कई काम हैं जो घर पर बैठकर किए जा सकते हैं। लेकिन दूसरों की देखा-देखी लोग खेती नहीं करना चाहते और गाँव छोड़कर बाहर जाना चाहते हैं। लगभग यही स्थिति अधिकांश लोगों की है।
उपाय की बात करें तो “पर उपदेश कुशल बहुतेरे।” यदि मैं स्वयं इस प्रक्रिया में शामिल नहीं हूँ, तो दूसरों को क्या उपदेश दे सकता हूँ ? फिर भी मन में बहुत कुछ करने की इच्छा है। मेरा मन बहुत दुखी होता है जब मैं सतकालिसिलंग से बजड़ी और अपने सेरे (खेतों) को देखता हूँ, आधे खेत बंजर हो चुके हैं। ऐसा लगता है मानो दीमक धीरे-धीरे पूरे सेरे को खा रहा हो और अंततः सब कुछ बंजर हो जाएगा।
इस समस्या का समाधान क्या हो सकता है ? गाँव में लोग आते तो हैं, लेकिन पर्यटकों की तरह। मेरे विचार से कुछ लोग एकत्र होकर इन बंजर खेतों के मालिकों से अनुरोध करके उनकी जमीन पर सामूहिक खेती शुरू कर सकते हैं। प्रारंभ में बिना किसी लेन-देन के काम शुरू किया जाए, फिर धीरे-धीरे एक सहकारी समिति बनाई जाए, जिसमें लोगों के खेत पंजीकृत हों।
इसके बाद लागत और आमदनी के आधार पर अनुपात तय कर, खेत मालिकों को भी उचित हिस्सा दिया जाए। शुरुआत में यह प्रयास गाँव तक सीमित रखा जाए और बाद में इसका विस्तार किया जा सके। सरकार का सहयोग भी लिया जाए और आधुनिक कृषि उपकरणों का उपयोग किया जाए।
शुरुआत में ऐसी फसलें उगाई जायें जिन्हें जानवर नुकसान नहीं पहुँचाते, और बाद में अन्य खेती भी शुरू की जा सकती है। उद्देश्य यह है कि उपजाऊ सेरे गाँव की आय में योगदान दें और लोगों की समृद्धि बढ़े।
साथ ही, गाँव में पर्यटन को बढ़ावा देना भी आवश्यक है। गाँव के स्कूलों का विशेष ध्यान रखा जाए, ताकि वहाँ की व्यवस्था और पढ़ाई सही ढंग से हो। इसके अलावा, गाँव में प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था होना भी अत्यंत आवश्यक है।
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