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उत्तराखण्ड

धामी सरकार की सजग पहल, बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर पहली विस्तृत सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी

ऑटिज्म, बौद्धिक विकलांगता और मानसिक विकारों की स्थिति पर मिला ठोस प्रमाण, “हर बच्चे को देखभाल, सहयोग और अवसर”

देहरादून। उत्तराखंड में पहली बार बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर व्यापक अध्ययन किया गया है। राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, बाल एवं किशोर मनोरोग विभाग तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य, रोग-गणना विज्ञान विभाग, निमहांस (राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान), बेंगलुरु के सहयोग से गवर्नमेंट डून मेडिकल कॉलेज, देहरादून द्वारा यह सर्वेक्षण पूरा किया गया। इस रिपोर्ट का विमोचन 11 नवम्बर 2025 को चिकित्सा स्वास्थ्य निदेशालय, देहरादून में किया गया।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में तथा स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत के मार्गदर्शन में राज्य सरकार मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में निरंतर प्रयासरत है। सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा डॉ. आर. राजेश कुमार के निर्देशन में राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण, उत्तराखंड द्वारा बच्चों और किशोरों में मानसिक विकारों की वास्तविक स्थिति का सर्वेक्षण करवाया गया। इस अध्ययन का उद्देश्य राज्य में बच्चों की मानसिक स्थिति की सटीक जानकारी प्राप्त कर भविष्य की नीति निर्धारण में सहयोग देना था। विमोचन कार्यक्रम में निमहांस की निदेशक डॉ. प्रतिमा मूर्ति मुख्य अतिथि रहीं। उनके साथ निदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य डॉ. शिखा जंगपांगी, निदेशक राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन डॉ. रश्मि पंत, सलाहकार एसएचएसआरसी डॉ. तृप्ति बहुगुणा, निमहांस के विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप और डॉ. के. जॉन विजय सागर, तथा मुख्य चिकित्सा अधिकारी देहरादून डॉ. मनोज शर्मा, मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण के सदस्य ललित जोशी मौजूद रहे। सभी विशेषज्ञों ने इस अध्ययन को राज्य की मानसिक स्वास्थ्य नीतियों के लिए एक ऐतिहासिक पहल बताया।

देश का पहला सामुदायिक आधारित मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण
यह रिपोर्ट न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश में अपनी तरह का पहला सामुदायिक आधारित सर्वेक्षण है। इसमें 0 से 17 वर्ष के आयु वर्ग के 802 बच्चों और किशोरों को शामिल किया गया। अध्ययन देहरादून, पौड़ी, अल्मोड़ा और नैनीताल जिलों में किया गया, जिससे पहाड़ी और मैदानी दोनों भौगोलिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व हुआ। रिपोर्ट में पाया गया कि बच्चों और किशोरों में ऑटिज्म, बौद्धिक विकलांगता और सामान्य मानसिक विकारों के मामलों में समय पर पहचान और उपचार की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है। अध्ययन में यह भी सुझाव दिया गया कि स्वास्थ्य विभाग के विभिन्न कार्यक्रमों और विद्यालय स्वास्थ्य अभियानों में मानसिक स्वास्थ्य की स्क्रीनिंग को शामिल किया जाए। साथ ही शिक्षकों और स्वास्थ्यकर्मियों को मानसिक स्वास्थ्य की पहचान और सहायता हेतु विशेष प्रशिक्षण देने की भी अनुशंसा की गई है।

मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त करने की दिशा में कदम
निमहांस और उत्तराखंड सरकार पहले से ही “टेली-मानस” और “नमन” जैसी योजनाओं के माध्यम से राज्य में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने का कार्य कर रहे हैं। यह रिपोर्ट भविष्य में बनने वाली राज्य स्तरीय कार्ययोजना के लिए एक ठोस आधार बनेगी, ताकि प्रत्येक बच्चे को समय पर पहचान, परामर्श और उपचार मिल सके। निदेशक राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन डॉ. रश्मि पंत का मानना है कि यदि इस रिपोर्ट की अनुशंसाओं को नीति स्तर पर लागू किया गया, तो उत्तराखंड बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक आदर्श राज्य बन सकता है। यह पहल राज्य सरकार की उस प्रतिबद्धता को भी दर्शाती है जिसके तहत “हर बच्चे को देखभाल, सहयोग और अवसर” सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस प्रयास किए जा रहे हैं।

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Ghanshyam Chandra

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