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हरिद्वार में कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान के लिए श्रद्धालु का सैलाब उमड़ा

आकाश ज्ञान वाटिका, हरिद्वार। आकाश ज्ञान वाटिका, हरिद्वार। मंगलवार, १२ नवंबर २०१९ को कार्तिक पूर्णिमा पर हरिद्वार के गंगाघाटों के साथ ही अन्य नदियों के तट पर आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान के साथ ही पूजा-अर्चना की।  हर की पैड़ी पर पुलिस ने कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की हुई थी। वहीं, ऋषिकेश में कार्तिक पूर्णिमा के पावन अवसर पर त्रिवेणी घाट सहित लक्ष्मण झूला स्वर्ग आश्रम और अन्य गंगा तटों पर सुबह से ही श्रद्धालुओं ने आस्‍था की डुबकी लगाई। सर्दी के बावजूद बाहर से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां गंगा स्नान के लिए पहुंचे हैं। कार्तिक पूर्णिमा पर दान पुण्य का भी काफी महत्व माना गया है। यही कारण है कि श्रद्धालु त्रिवेणी घाट पर उपस्थित गरीब और असहाय लोगों को अनाज व अन्य सामग्री दान दी।

कार्तिक पूर्णिमा का स्नान सभी गंगा स्नान में प्रमुख माना जाता है। इस स्नान पर सबसे अधिक भीड़ जुटती है। यही कारण यहा कि तड़के से ही हरिद्वार में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। बीती रात से ही पुण्यकाल शुरू हो गया था। इसलिए सोमवार से ही लोग हरिद्वार पहुंचने लगे थे। रात भर से लोगों के डग हरकी पैड़ी की ओर बढ़ते रहे। ब्रह्म मुहूर्त से स्नान शुरू हुआ। दिन चढ़ने के साथ भीड़ बढ़ने लगी। स्नान के चलते हरकी पैड़ी, सर्वानंद घाट, बिरला घाट, लवकुश घाट, विश्वकर्मा घाट, प्रेमनगर आश्रम घाट आदि घाटों पर श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ा रहा। सनातनी मान्यता के अनुसार श्रद्धालुओं ने गंगा पूजन और गंगा अभिषेक भी किया। स्नान के बाद हरिद्वार के मंदिरों के दर्शन और पूजन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटी।

कार्तिक मास को सभी महीनों का राजा कहा गया है। ज्योतिषाचार्य पंडित शक्तिघर शर्मा शास्त्री के अनुसार भगवान कृष्ण कहते हैं कि जितने भी मास हैं, उनमें कार्तिक मास मैं ही हूं। कार्तिक मास भगवान विष्णु को समर्पित होता है। कार्तिक मास में ही सभी महत्वपूर्णं त्योहार होते है, यही कारण है कि कार्तिक मास में ही मां लक्ष्मी और अमृत कलश लिए हुए भगवान धन्वंतरी का समुद्र मंथन के समय इस सृष्टि में प्राकट्य हुआ था। देवस्थान का समय भी एकादशी शुक्ल पक्ष को होता है।

 इसी के बाद सब शुभ कार्यों का आरंभ माना गया है। विवाह आदि शुभ कर्म और देव प्रतिष्ठा आदि भी इसी मास में होते हैं। जब पूर्णिमा आती है, उसको देव दीपावली कहा गया है। देवताओं का पूजन शुद्ध घी, गाय के घी से दीपक जलाकर किया जाता है। यह पर्व जितना पृथ्वी के प्राणियों के लिए आवश्यक है , उतना ही महत्वपूर्ण देवताओं के लिए भी माना गया है। यही कारण है कि इस पर्व की जो पूर्णिमा होती है। वह सर्वाधिक शुभ और सभी मनोकामना को पूर्ण करने वाली होती है, क्योंकि इस दिन सत्यनारायण व्रत की पूजा दान स्नान तथा अनेक प्रकार के यज्ञ इसी में संपन्न होते हैं।

मान्यता है कि इस दिन जो मनुष्य भगवान विष्णु का ध्यान करता है, गंगा में पूजा अर्चना  विष्णु एवं शिव की जो पूजा करता है, कमल के पुष्प सहित पूजा और आराधना करता है | विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ करता है, उसको वैकुंठ प्राप्त होता है | ऐसा शास्त्रों में लिखा है। आज के दिन सत्यनारायण भगवान का व्रत करने के बाद अनाज और गर्म वस्त्र एवं फलों का दान मिष्ठान आदि ब्राह्मणों को दान करना चाहिए।

शास्त्रों के अनुसार इस दिन का सबसे बड़ा महत्व माना गया है। क्योंकि यह भगवान विष्णु का मास है और गंगा में एक महीने तक सभी पृथ्वी के लोग गंगा में स्नान करते हैं। इसीलिए कार्तिक महत्तम में सबसे बड़ा है। इसका वैज्ञानिक पहलू यह है कि शीतकालीन मौसम में अपने शरीर को उस शीतकालीन ऋतु के अनुकूल बनाने के लिए गंगा में स्नान करने से कोई दिक्कत नहीं आती। इससे हमारा शरीर आने वाली उस शीतकालीन मास को सहन करने की शक्ति प्राप्त कर सके।

सिख धर्म की मान्यताओं के अनुसार गुरु नानक देव का जन्मोत्सव प्रकाश उत्सव इसी दिन मनाया जाता है। गुरु नानक देव सिखों के प्रथम गुरु हैं। दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह थे, जिन्होंने गुरु नानक देव के विचारों को संकलित कर के 36 गुरुओं की वाणी को एक सूत्र में बांधकर गुरु ग्रंथ साहब का संकलन करके गुरु ग्रंथ साहब को ही गुरु माना। सिख धर्म का आरंभ 13 अप्रैल 1699 को बैसाखी के दिन हुआ था और तभी से गुरु नानक देव की जयंती कार्तिक पूर्णिमा को इसलिए मनाई जाती है क्योंकि उनके विषय में कहा गया है कि गुरु नानक परगटया।। मिटी धुंध जग चानन होया।।

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Ghanshyam Chandra

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