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बाणी गुरू,  गुरू है बाणी

बाणी गुरू,  गुरू है बाणी

बाणी गुरू गुरू है बाणी,
विचि बाणी अंम्रितु सारे।।’’
गु.ग्र.सा. (पन्ना-९८२)

सिक्खों के पवित्र ग्रन्थ ‘‘गुरू ग्रन्थ साहिब’’ अन्तर्गत पृष्ठ संख्या ‘‘982’’ में अंकित उक्त बाणी जहाँ एक ओर ग्रन्थ की सम्पूर्ण बाणी को गुरू का ही पर्याय मानती है, वहीं इस पुनीत सम्पूर्ण बाणी को अमृत की संज्ञा दी गई है। इस उच्च अमृत भाव के दर्शन हमें ग्रन्थ में अन्यत्र भी प्राप्त होते हैं, उदाहरणार्थ:-

‘‘अंम्रित बाणी अमिउ रसु,
अंम्रितु हरि का नाउ।’’
गु.ग्र.सा.(पन्ना-९६३)
‘‘मेरे मन नाम अंम्रितु पीउ ’’
गु.ग्र.सा.(पन्ना-१007)
‘‘अंम्रित नाम गुरू वड दाणा,
नामु जपहु सुख सारा हे’’।
गु.ग्र.सा.(पन्ना-१0२९)
‘‘अंदरू अंम्रिति भरपूर है,
जिन चाखिआ से निरभउ भए।’’
गु.ग्र.सा.(पन्ना-१0९२)
‘‘अंम्रित नामु मनहि आधारो’’।
गु.ग्र.सा.(पन्ना -१२१५)
‘‘गुरमुखि अंम्रितु नामु है,
जितु खाधै सभ भुख जाइ।’’
गु.ग्र.सा.(पन्ना-१२५0)
‘‘अंम्रितु हरि का नामु है,
जितु पीवै तिख जाइ’’
गु.ग्र.सा.(पन्ना-१२८३)

परमात्मा के नाम रूपी अमृत वाणी से परिपूर्ण होने के फलस्वरूप ही गुरू ग्रन्थ साहिब जी को परमेश्वर का पवित्र स्थान स्वीकृत किया गया है तथा इस भाव की पुष्टि ग्रन्थ में अंकित निम्न बाणी से होती है:-

‘‘पोथी परमेसर का थानु,
साधसंगि गावहि गुण गोबिंद।
पूरन ब्रह्म गिआनु ।। ’’
गु.ग्र.सा.(पन्ना-१२२६)

अतः नाम-अमृत से परिपूर्ण तथा गुरू रूप पवित्र बाणी से ओत-प्रोत होने के कारण ही सिक्खों के दसवें गुरू, गुरू गोविंद सिंह जी के मुखारविंद से अकाल-पुरूष का निम्न पवित्र आदेश प्रस्फुटित हुआ कि भविष्य में समस्त गुरू शिष्यों को ‘‘श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी’’ को ही गुरू रूप में स्वीकृत करना है:-

‘‘अग्या भई अकाल की,
तबै चलायो पन्थ।
सब सिक्खन को हुकुम है,
गुरू मानियो ग्रन्थ।।’’

गुरूबाणी का खजाना, ‘‘श्री गुरू ग्रन्थ साहिब’’ विश्व का एकमात्र ऐसा पवित्र व महानतम ग्रन्थ है जो देश, काल, वर्ण, वर्ग, भाशा, संप्रदाय तथा मत-मतान्तरों की सीमाओं को लाॅघकर निरन्तर प्रेम, भक्ति, मैत्री, करूणा, सुह्नदयता, त्याग, बलिदान, सेवा तथा परोपकारिता आदि दिव्य सन्देशों द्वारा मानव जीवन को सद्मार्ग तथा ईश्वर भक्ति की ओर प्रेरित करता रहेगा।
‘‘श्री गुरू ग्रन्थ साहिब’’ के प्रथम संस्करण के संपादन का मुख्य कार्य पाँचवें गुरू अरजनदेव जी द्वारा सन् 1604 ई॰ में श्री रामसर साहिब नामक स्थान पर गुरू-घर के महान विद्वान, साधक व लेखक भाई गुरूदास जी की लेखनी द्वारा ‘‘पोथी साहिब’’ के रूप में हुआ तथा अमृत सरोवर के मध्य निर्मित ‘‘हरिमंदर साहिब,’’ में इस ग्रन्थ को सुशोभित करवाया गया। साथ ही गुरू जी द्वारा विश्व प्रसिद्ध इस गुरूद्वारे की नींव मुस्लिम सूफी फकीर सांई मीआं मीर द्वारा रखवाकर, धर्म निरपेक्षता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया गया था।
‘‘श्री गुरू ग्रंथ साहिब’’ का दूसरा संस्करण दशम पिता श्री गुरू गोविंद सिंह जी ने सन् 1706 ई॰ में भाई मनी सिंह द्वारा लिखवाया, जिसमें प्रथम पाँच गुरूओं अर्थात श्री गुरू नानक देव, श्री गुरू अंगद देव, श्री गुरू अमरदास, श्री गुरू रामदास तथा श्री गुरू अरजनदेव जी द्वारा उच्चरित वाणी के अतिरिक्त नवम् गुरू श्री गुरू तेग बहादुर साहिब जी की वाणी को भी सम्मिलित किया गया। उक्त छः गुरू साहिबानों की अमृत वाणी के साथ ही ग्रन्थ में पन्द्रह भक्तों, अर्थात् भक्त कबीर दास जी, भक्त रविदास (रैदास) जी, भक्त नामदेव जी, भक्त त्रिलोचन जी, भक्त धंना जी, भक्त भीखण जी, भक्त सैण जी, भक्त पीपा जी, भक्त जैदेव जी, भक्त सूरदास जी, भक्त रामानन्द जी, भक्त सधना जी, भक्त बेणी जी, भक्त परमानन्द जी तथा मुस्लिम सन्त शेख फरीद जी के अतिरिक्त ग्यारह विद्वान भट्ट साहिबानों अर्थात् भट्ट कल्हसार जी, भट्ट जालप जी, भट्ट कीरत जी, भट्ट भिखा जी, भट्ट सल्ह जी, भट्ट भल्ह जी, भट्ट नल्ह जी, भट्ट गयंद जी, भट्ट मथरा जी, भट्ट बल्ह जी, भट्ट हरिबंस जी तथा गुरू घर के निकटवर्ती चार गुरू सिक्खों, बाबा सुंदर जी, भाई सत्ता जी, भाई राय बलवंड़ जी एवं भाई मरदाना जी की दिव्य वाणी को सम्मिलित किया गया है।
श्री गुरू ग्रन्थ साहिब की सम्पूर्ण वाणी के अंतर्गत सर्वाधिक 2313 पद गुरू अरजनदेव जी द्वारा, 891 पद गुरू अमरदास जी द्वारा, 644 पद गुरू रामदास जी द्वारा तथा 537 पद सन्त कबीर दास जी द्वारा निबद्ध हैं। इस प्रकार ‘‘श्री गुरू ग्रंथ साहिब’’ एक सर्वोच्च बहुमुखी ग्रन्थ होने के साथ ही, यह भारत के पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण विभिन्न क्षेत्रों तथा भाषाओं का सफल प्रतिनिधित्व करता है। ‘‘श्री गुरू ग्रंथ साहिब’’ की सम्पूर्ण वाणी को 1430 पृष्ठों में अंकित किया गया है तथा पूरी बाणी 31 राग-रागनियों में निबद्ध है।
अतः हमारे लिये यह नितान्त आवश्यक है कि हम ‘‘श्री गुरू ग्रंथ साहिब’’ की अमृतमय वाणी को हृदयंगम करते हुये व श्री गुरू नानक देव जी के पवित्र उपदेशों को जीवन में उतारकर एक सुदृढ़ समाज की स्थापना में अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करें।

                                                                                                                                                                                                                                                  साभार:   विश्वम्भर दयाल पण्डे
सहायक अधिशासी अभियंता(सेवानिवृत्त)
एम. ई. एस.
सी – ९९, नेहरू कॉलोनी, देहरादून
मो. – 9358122505

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Ghanshyam Chandra

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